हनुमान जी के मंदिर पर आधा चांद !

नई दिल्ली । मंगलवार की सुबह के चार बजते ही क्रिकेट कोच अजय वर्मा अपने पिता को लेकर अँधेरे में हनुमान मंदिर के लिए निकल पड़ते हैं।  उनके पिता 60 साल से बिना नागा दिल्ली के खड़क सिंह मार्ग स्थित हनुमान मंदिर जाते ही हैं।  घर में खुशी हो या गम लेकिन ये सिलसिला आज तक नहीं टूटा।  अजय को याद है बचपन से उनका भी यही नियम सा रहा है।  और अजय ही क्यों दिल्ली में जितने भी हनुमान भक्त हैं वो कोशिश करते हैं कि मंगलवार को एक हाज़िरी इस मंदिर की लगा आये।  क्योंकि इस मंदिर की आस्था इतनी पुरानी है जितनी की महाभारत।

कहते हैं कि दिल्ली में पांडवों के ज़माने से कुछ मंदिर ऐसे हैं जो आज भी शक्ति का केंद्र हैं और लोगों का जुड़ाव उनसे बढ़ता ही जा रहा है।  खड़क सिंह मार्ग का हनुमान मंदिर, कालका माँ का मंदिर, महरौली का योगमाया मंदिर, पुराने किले का भैरव मंदिर और निगमबोध घाट का नीली छतरी महादेव मंदिर।  आलम ये है कि दिल्ली में हज़ारों हनुमान मंदिर होंगे लेकिन हनुमान मंदिर मतलब बाबा खड़क सिंह मार्ग ही है।

 

आस्था है कि हनुमान जी की मूर्ति स्वयंभू है यानी स्वंय उत्पन्न हुई है।  लेकिन इतिहास बेहद पौराणिक है।  कहा जाता है कि पांडव इंद्रप्रस्थ से राज करते थे।  लेकिन एक दिन पांडवों  के सबसे बड़े भाई धर्मराज युधिष्टर कौरवों से जुए में अपना राजपाठ सब हार गए।  हार की एक शर्त थी कि उन्हें 14 साल का वनवास भोगना पड़ेगा।  कुछ वक़्त पांडव अलवर के पास सरिस्का के जंगलों में गुजार रहे थे कि द्रौपदी को प्यास लगी।  पवनपुत्र भीम पानी की तलाश में निकले।  पानी लेकर लौट रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक बन्दर मिला।  बंदर की पूँछ रास्ते में थी तो भीम ने बंदर से पूँछ हटाने को कहा।  बंदर ने पूँछ नहीं उठायी बोले बूढ़ा हूँ आप ही उठा दो भाई।  क्रोध में आकर भीम ने जैसे ही पूँछ उठायी तो वो पूँछ उठा नहीं पाया।  भीम समझ गया कि ये कोई साधारण वानर नहीं  है।  दरअसल वो वानराधीश हनुमान जी थे।  हनुमान जी ने भीम का घमंड तोड़ने के लिए ये लीला रची थी।  उन्होंने भीम से कहा कि वो महारभारत के धर्मयुद्ध में आएंगे  और आये भी।  अर्जुन के रथ पर कपिध्वज की रूप में उन्होंने युद्ध को ताकत दी।  पांडवों ने युद्ध जीतने के बाद अपने राज इंद्रप्रस्थ में पांच मंदिर स्थापित किये जिसमें से ये हनुमान मंदिर भी एक था।

लेकिन मंदिर को बाहर से देखें तो बुर्ज पर ॐ या कलश की जगह अर्धचंद्र दिखाई देता है।  मंदिरों पर अर्धचंद्र नहीं लगाया जाता क्योंकि इसे मुस्लिम प्रतीक माना जाता है।  अगर ऐसा है तो ये कब और किसने स्थापित किया होगा।  क्या वजह रही होगी इस प्रतीक के पीछे।  कहा जाता है कि गोसांई तुलसीदास मुग़लों के दौर में इस मंदिर के दर्शन को आये थे तो उन्हें बादशाह ने महल बुला लिया और उनसे एक चमत्कार करने को कहा।  तुलसीदास ने चमत्कार दिखा दिया और बादशाह ने इस मंदिर को बचाने के लिए इस पर अर्धचंद्र लगवा दिया ताकि कोई मुस्लिम शासक इसे तोड़ने की हिम्मत न कर सके।  अकबर के मंत्री मान सिंह ने इस मंदिर का जीणोद्धार किया उसके बाद 1724 में महाराजा जय सिंह ने इसको दोबारा ठीक करवाया।

5000 साल से ज्यादा ये मंदिर आस्था, शक्ति और भक्ति का केंद्र है।  चुपचाप बहुत बड़े संत इस मंदिर में दर्शन को आते रहे हैं।  1964 से आज तक 24 घंटे इस मंदिर में बिना रुके राम राम  का जाप निरंतर जारी है और ये GUINESSS BOOK OF WORLD RECORDS में दर्ज हो चुका है।  हैड़ाखान बाबा की कृपा से यहाँ रोज एक भंडारा भी लगाया जा रहा है।  ये बात साबित करती  है कि भले ही हैड़ाखान बाबा हिमालय में रहा करते हो लेकिन इस मंदिर के प्रति उनकी आस्था रही है।

 

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