नंदा देवी के रूप में मिले महावतार बाबा 

नई दिल्ली। हिमालय की शिवालिक रेंज एक ऐसी रेंज है जहाँ तेज नदियां और लैंड स्लाइड्स जीवन का हिस्सा जैसा है।  सड़क कब गायब हो जाये कोई नहीं कह सकता।  हालाँकि बॉर्डर रोड्स आर्गेनाईजेशन की ज़बरदस्त मेहनत है कि ज़िन्दगी यहाँ रुकती नहीं है। कर्णप्रयाग से हम रूप कुंड जाने के लिए बिलकुल एक तन्हा रास्ते पर कट गए। रात हो चुकी थी। सड़क पर हमारी गाड़ियों की सिवाय कोई और दिखाई नहीं दे रहा था।  चांदनी रात थी लेकिन उसका कोई बहुत फायदा हमें नहीं मिल रहा था।  घाटियों में मन्दाकिनी नदी का शोर हमारे कानों को भेदता हुआ अंदर घुस रहा था।  शायद वो हमें चेतावनी दे रहा था कि सोना नहीं है। नज़र सड़क पर ही रखो क्योंकि एक छोटी सी गलती और फिर गलती की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी।

बेहद लम्बा रास्ता पार कर हम पहुंचे देवाल, जहाँ 90 किलोमीटर के बाद हमें कुछ जगे हुए इंसान मिले।  भूख जोरों पर थी और ये लोग दाल और रोटी पका रहे थे।  हम लोगों ने पूछा कि क्या हमें भी कुछ खाना मिल सकता है तो जवाब मिला जितना है बाँट लेंगे। बस बैठ गए एक छोटी सी दुकान के बाहर और इंतज़ार करने लगे कि कब दाल पक जाएगी। तेंदुओं का भी बहुत डर था देवाल में। कुत्तों से ज्यादा वही रात में यहाँ घूमते हैं। कुत्ते उनके डर से कहीं छुपे हुए बैठे रहते हैं। खैर, कुछ देर में उड़द की दाल, मोटे चावल और रोटियां तैयार थीं। उन्होंने पेट भर खाना खिलाया। हमने कुछ रुपए उन्हें दे दिए। इस घटना का जिक्र इसीलिए जरुरी है क्योंकि शहर के आराम से जब आप शिवालिक जैसे इलाके में हों तो छोटी मदद भी बहुत बड़ी मदद बन जाती है।

रूप कुंड की यात्रा के बाद देवाल से हमने द्वारहाट होते हुए नैनीताल और दिल्ली जाने का फैसला किया।  ये नहीं सोचा था कि कुछ अदृश्य शक्तियों ने कुछ और हमारे लिए तय किया हुआ था।  देवाल से निकले तो फिर इंसानी बस्तियां ख़त्म हो गयीं। ग्वालधाम तक एक सुनसान – घनघोर  जंगल था जिसमें धूप भी घुसने के लिए जद्दोजेहद कर रही थी। कई बार मन में विचार आया कि अगर यहाँ कुछ हमारे साथ घटना घट जाए तो हम मदद कैसे लेंगे। कौन आएगा  क्योंकि फ़ोन तो काम ही नहीं कर रहे थे। मन के इन विचारों के बीच धीरे धीरे चलते हुए ग्वालधाम आ गया। एक बुजुर्ग को देखकर मन में संतोष आ गया कि अब डर की बात ख़त्म हो गयी है।  ग्वालधाम से निकलकर हम पहुंचे बिन्ता जहाँ से हमने दुनागिरि महावतार बाबा की गुफाओं के लिए रास्ता ले लिया।  कुछ देर लोगों की  भीड़ मिली लेकिन वो सिर्फ दुनागिरि माता मंदिर तक ही थी।  लेकिन हमें उससे आगे जाना था।  जीप की रफ़्तार कम हो गयी क्योंकि अब  नहीं मालूम था कि जाना कहाँ है।

हमने कोशिश की कि कहीं कोई मिल जाए लेकिन कोई नहीं मिला। जीप धीरे धीरे आगे बढ़ती रही। और आखिरकार रास्ता एक दुकान पर जाकर ख़त्म हो गया। ये कुकछिना गांव था। एक लड़के ने मुस्कुराकर कहा कि दुनागिरि गुफा का अब पैदल रास्ता है। उसी की दूकान के बराबर से एक टूटा रास्ता खाई की तरफ उतर रहा था। मैं और टोनी नीचे उस रास्ते पर चल दिए।  करीब 2 किलोमीटर चलने के बाद जैसे हम भटक से गए। अब गुफा के लिए कहाँ जाना है  मालूम ही नहीं था।  कोई बताने वाला भी नहीं दिख रहा था। दोपहरी का वक़्त था। तभी किसी ने पहाड़ के ऊपर से आवाज लगायी।  हमने देखा कि एक महिला है।  जैसे जैसे  रास्ता दिखा हम चलते गए और आख़िरकार उनके घर पहुँच गए।  देखते ही उन्होंने हमें पानी दिया।  एक बढ़िया ठंडा पानी।  पीकर लगा जैसे जन्नत मिल गयी हो।  इससे पहले कि हम कुछ बोलते घर के अंदर जाकर चाय का पानी रख दिया।

उनके पति ज्यादा कुछ नहीं कह रहे थे लेकिन नंदा देवी हमारी खातिर में लगीं थीं।  कोई  जान पहचान नहीं।  पहली मुलाकात में मानो अपना पूरा घर ही खोलकर रह दिया उन्होंने।  अभी चाय बन ही रही थी कि हमारे साथ बैठकर आलू छीलने लगीं।  बोलीं महावतार बाबा के धाम आये हो।  मैंने कहा हाँ।  पूछा कैसे जानते हों उन्हें-किसने गुफा का पता बताया। इतने में उनके पति ने चाय हमारे सामने रख दी।  बोले, घर के दूध की है।  एक चुस्की ली तो फर्क भी पता चल गया कि खालिश दूध किसे कहते हैं।  चाय पीते पीते मैंने  उन्हें बताया कि लाहिरी बाबा की वजह से यहाँ आया हूँ।  बोलीं गुफा के दर्शन कर आओ लेकिन यहीं आकर मिलकर जाना।  गुफा का रास्ता बताने के लिए नंदा देवी ने अपने पति को हमारे साथ भेज दिया।  उन्होंने रास्ता दिखाया और लौट गए।  उस रास्ते पर फिर हमें राणा जी मिले जिन्होंने गुफा तक हमारा साथ दिया।  महावतार बाबा की पवित्र गुफा के दर्शन के बाद हम फिर नंदा देवी के घर गए।

बिना पूछे दरी बिछा दी और दो थालियां हमारे सामने रख दी।  आलू की सब्जी – रोटियां  और सलाद था।  लगा की महावतार बाबा ने प्रसाद दिया हो। बहुत चैन से भोजन किया।  भोजन के बाद एक एक कप चाय और पी।  मन में विचार आया कि कुछ पैसे उन्हें दे दूँ।  जेब में हाथ डालकर मैंने 500 रुपए का नोट निकलकर उन्हें

दिया तो नाराजगी जाहिर की उन्होंने।  बोलीं बाबा का दिया सबकुछ है। छोटे भाइयों को खाना नहीं दे  सकती क्या मैं।  अब पैसे का मोल नहीं रह गया। महावतार बाबा की लीला देखकर मन भावुक हो गया  कि इतने वीराने में वो सबकुछ कर सकते हैं।  चलने का वक़्त हो चला।  लेकिन नंदा देवी एक थैला लिए खड़ी थीं। थैले में राजमा थे – बोलीं मेरे खेत के हैं।  मैंने मना किया तो कहा कि खाली  हाथ जाना ठीक नहीं।  नंदा देवी में अब महावतार बाबा दिखने लगे।  महसूस हुआ कि अदृश्य गुरु आखिर कैसे लीला करते हैं।  कोई साधु वेश नहीं चाहिए बस एक साधारण इंसान भी कभी कभी संत बन सकता है।

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