OMG :140 साल का योगी 

नई दिल्ली । जहाँ शिव वहां शान्ति और जहाँ शान्ति वहां शिव।  अल्मोड़ा से 50 किलोमीटर दूर एकांत में जागेश्वर में ऐसा लगता है मानो शिव सदाशिव बन गए हों जो अपनी गहन समाधि में हों।  पाइन या देवदार के पेड़ों से होकर ठंडी हवाएं सीधी फेफड़ों तक जाती हैं।  घने जंगलों के बीच जटा गंगा की आवाजें पूरी घाटी में गूंजती रहती है।  कभी आदिशंकरचार्य यहाँ आये थे। उन्होंने यहाँ 126 मंदिरों की स्थापना की थी। कहते हैं कि पूरे भारत में महामृतुंजय मंदिर यही है जहाँ लोग अपनी और पूरे परिवार की लम्बी उम्र की पूजा करते हैं।  यहाँ शिव और शक्ति को एक स्वरुप में पूजा जाता है।

किसे ने बताया कि जागेश्वर से 14 किलोमीटर दूर वृद्ध जागेश्वर भी एक सिद्ध स्थान है जहाँ शिव का पौराणिक रूप है।  जहाँ आज भी प्राचीन तरीके से ही सब किया जाता है।  सुबह 5 बजे वृद्ध जागेश्वर के लिए तैयार हो गया।  तारा गेस्ट हाउस के नवीन भट्ट जी ने चाय बना दी लेकिन कहा कि जब सूर्य नारायण की पहली किरण पड़े तो यात्रा शुरू करना।  नवीन के मुताबिक सुबह सुबह तेंदुए रास्ते में मिल सकते हैं और कभी कभी बाघ भी।  जागेश्वर में हमेशा ठण्ड का मौसम रहता है।  चाय ने कंपकपाती आत्मा को जैसे ज़िंदगी से दे दी।

5  30 बजे घाटी में डमरू बज गए।  जागेश्वर मंदिर के कपाट खुल गए और थोड़ी देर में धुने से धुंआ उठने लगा।  अब वक़्त था वृद्ध जागेश्वर जाने का।  जागेश्वर एक छोटा सा गांव है बमुश्किल 100 घर होंगे।  मंदिर से ही उनकी दुनिया शुरू  और ख़त्म होती है।  कुछ विदेशी लोग यहाँ महीनों आराम करने आते हैं।  खैर धीरे धीरे मैं और कुछ दोस्त जागेश्वर मंदिर की तरफ चल दिए।  ये मंदिर दरसल टूरिस्ट से अलग सा है।  बहुत कम लोग ही वहां दर्शन को जाते हैं।  और ये है भी एक चोटी पर स्थित तो वहां पैदल पहुंचना आसान नहीं है।  हालाँकि सड़क से गाडी भी वहां जाती है।  लेकिन हमने तो पहाड़ चढ़ने का फैसला ले लिया।  कठिन चढ़ाई थी।  और लगभग 2 घंटे पैदल चलने के बाद मंदिर पहुँच गए।  मंदिर बिलकुल आपको 200 साल पीछे ले जायेगा।  न बिजली और न ही कोई और सुविधा – सब कुछ जैसे वक़्त के साथ ठहर सा गया है यहाँ।  दर्शन  करने के बाद वापस चलने लगे तो पुजारी ने कहा कि आप हनुमान मंदिर भी हो लो वहां एक सिद्ध संत रहते हैं।  उसने बताया कि बाबा शिवराज गिरी 100 साल से यहीं हनुमान मंदिर में रहते हैं।

उम्र सुनकर मन में मिलने की इच्छा जाग गयी।  1 किलोमीटर पैदल चलने के बाद एक कपिध्वज दिखाई दिया।  देखकर ही पता चल गया कि यही हनुमान मंदिर है।  सो हम सब मंदिर की तरफ चल दिए।  लेकिन कोई इंसान वहाँ नहीं दिखा।  हनुमान जी के दर्शन किये लेकिन ऑंखें बाबा शिवराज गिरी को ढूंढ रहीं थीं।  खैर कुछ देर बाद एक छोटा सा बालक वहां  आ गया।  बोला आप बाबा से मिलने आये हो।  अँधा क्या चाहे दो आँखें – हम पीछे पीछे हो लिए उसके।  वो हमे एक छोटी से कुटिया तक ले गया।  थोड़ा जोर से बोला – बाबा कुछ भक्त आये हैं आपसे मिलने।  अंदर से आवाज आयी – राम राम।

बालक ने हमें अंदर आने को कहा।  एक छोटा सा पलंग था।  पास एक अंगीठी सुलग रही थी।  बाबा मंद मंद राम राम राम राम जप रहे थे।  हम सबने पाँव छुए उनके – लेकिन जैसे उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ा कि कोई आया भी है।  वो अपने मन्त्र की दुनिया में खोये हुए थे।  मैंने बालक से पूछा कि बाबा की क्या उम्र होगी – बालक बोला कि गाँव  के लोग कहते हैं कि बाबा कम से कम 140 साल के हैं।  100 साल से यहीं मंदिर में हैं और जब आये थे तो भी  उम्र काफी थी इनकी।

 

हमने पूछा – कौन सेवा करता है बाबा की।  बालक ने कहा हनुमान जी पूरा ध्यान रखते हैं इनका।  वैसे आस पास के दस गांव में से हर दिन कुछ न कुछ आता ही मंदिर के लिए।  लेकिन बाबा सिर्फ खिचड़ी और दूध पीते हैं।  बाकी भोजन बाँट दिया जाता है।  ये कहते ही बालक ने हम सबको एक एक सेब प्रसाद के तौर पर दिया।  बहुत देर तक शिवराज गिरी जी को देखता रहा लेकिन उन्हें हममें कोई दिलचस्पी नहीं थी।  मंद मंद राम राम राम  जाप निरंतर चल रहा था।  क्या पूछते और क्या जवाब मिलता लेकिन उन्होंने बिना कुछ कहे बता दिया कि जो करो उसमें डूब जाओ।

 

एक सच्चा योगी जो हिमालय में इतनी ऊंचाई पर बिना किसी लोभ लालच के सिद्धि में लगा है।  बालक ने कहा तो उन्होंने सबके सर पर हाथ फेर दिया।  हमारे लिए उतना ही काफी था।  शायद जीवन में दोबारा न मिल पाए लेकिन उन्हें देखना अपने आप में काफी था।  कुटिया से निकले तो सामने नंदा देवी की ऊँची चोटियों पर बर्फ धीरे धीरे उड़ रही थी।  हिमालय हमेशा एक अनसुलझी पहली  ही है।  और हम दोबारा जागेश्वर की तरफ बढ़ गए।

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