रूपकुंड में नरमुंड

नई दिल्ली ।  देवाल गांव में सूरज की पहली किरण भी नहीं पड़ी थी कि दूर खेतों से घंटियां बज रहीं थीं। छोटी कद काठी की गायें खेतों में चारा चरने आ चुकीं थीं।  शिवालिक माउंटेन रेंज के ये कुछ ऐसे गांव हैं जहाँ टूरिस्ट कम ही दिखाई देते हैं।  सुबह के 5 बजते ही नितिन काहेरा के मार्गदर्शन में बम लाहिरी एक्सपीडिशन टीम निकल पड़ी रूपकुंड को फ़तेह करने।  इस बार इस टीम में हर कोई लगभग किसी न किसी खेल  से जुड़ा खिलाडी ही था।  नितिन, मयंक, मुकुल, रोहित, अतुल स्टेट लेवल खिलाडी रह चुकें हैं और जब बात रूपकुंड की हो तो फिटनेस भी कभी कभार हार मान जाती है।

रूपकुंड हमेशा से उन लोगों को लुभाता रहा है जो हिमालय के अनछुए पहलुओं को करीब से देखने का इरादा रखते हैं।  रूपकुंड त्रिशूल पर्वत के निकट 5200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।  ये कुंड तब सुर्ख़ियों में आया जब 1942  नंदा देवी गेम रिज़र्व के रेंजर मढ़वाल ने यहाँ इंसानी हड्डियों को लेक के आसपास बिखरा पाया।  हालाँकि ब्रिटिश को लगा कि वो नरमुंड और हड्डियां जापानी सैनिकों की हैं लेकिन शोध से सामने आया कि नर कंकाल दरसल 19 वी शताब्दी के हैं।  पहाड़ी लोग मानते हैं कि ये इलाका रहस्यमयी है।  कहानी ये है कि राजा यश धवल अपनी पत्नी और सेना के साथ यहाँ से जा रहे थे कि अचानक ओले गिरे।  छिपने की कोई जगह नहीं थी और वो सब मारे गए थे।   लोगों का मानना है कि दरअसल ओले लोहे के थे।  किस्से और कहानियों के बीच रूपकुंड में नरकंकालों का निकलना जारी रहा।  रूपकुंड ज्यादा गहरा लेक नहीं है और उसकी तलहटी में नरकंकाल देखे जा सकते हैं।

नितिन और टीम देवाल से निकलकर लोहरगंज पास की तरफ बढ़ गए।  लोहरगंगपास देवाल से 30 किलोमीटर दूर है।  शिवालिक के इस  इलाके में सड़क कम ही दिखाई देती है।  लोहरगंज से निकलकर टीम पहुंची वाण।  यहाँ पहुंचकर नितिन ने  सबसे पहले टेंट्स का इंतज़ाम किया क्योंकि यहाँ से अब पैदल  ही बेदिनी बुग्याल पहुंचा था जो कि 12 किलोमीटर लम्बी यात्रा थी।

 

थोड़ा खाना और टेंट लेकर ये एक्सपीडिशन की टीम अपने सफर के लिए रवाना हो गयी।  पहले पांच किलोमीटर ढलान थी और रास्ता कटने लगा।  जहाँ ढलान ख़त्म हुयी वहां एक बेहद खूबसूरत नदी थी। नील गंगा इतनी साफ़ हैं कि मन्दाकिनी से तुलना की जा सके।  टीम जो थोड़ी बहुत हुयी थी उसने यहाँ पानी पीकर आराम किया।  एक बार को तो यहीं टेंट लगाने का मन  हो आया लेकिन अभी तो बस शुरुआत भर ही थी।

नितिन ने सबको अब दोबारा शुरू होने के लिए कहा।  एक्सपीडिशन टीम के सामने अब एक सीढ़ी चढ़ाई थी।  और जो सबसे खतरनाक अड़चन थी वो थी अलटीटुडे सिकनेस जिसे अभी शुरू होना था।  खैर टीम ने दोबारा चलना शुरू कर दिया।  लेकिन इस बार अब मामला बिगड़ने लगा।  सांस तेज हो गई।  अचानक सभी लोग थकने लगे।  जरा सा चलें और बैठ जाएँ।  नितिन जो बेहतरीन ट्रेकर है उसे भी थकान महसूस हुयी लेकिन ये सब शायद भूल गए कि अलटीटुडे यानी ऊंचाई के अपने तौर तरीके होते हैं।

पीयूष तो जैसे हार मान चुके थे लेकिन नितिन ने सभी को हौंसला दिया और सब टूटी हुयी हिम्मत को जोड़कर फिर चलने लगे लकिन  पीयूष के लिए परेशानियां ख़तम नहीं हो रहीं थीं।  गैरोली पटल अभी भी 4 किलोमीटर  था और टीम टूटन का शिकार हो रही थी। नितिन ने सबसे कहा कि कोई किसी को छोड़ेगा।  आराम से चलते चलते – एक दूसरे को होंसला देते टीम अगले २ घंटे में  पहुँच गयी गैरोली पटल।  चाय की दूकान देखकर जैसे भगवान् मिल गए।  गरमा गर्म चाय जैसे ही भारतीय शरीर में गयी मानो खून ने उबाला मारा।  बस तय कर लिया कि अब अली बुग्याल पहुंचकर ही अगली चाय पी जाएगी।

सामने त्रिशूल पर्वत से बर्फ उड़ती हुयी साफ़ देखी जा सकती थी।  ठण्ड ऊंचाई की तरह बढ़ रही थी।  अली बुग्याल तक भारतीय चाय बीच रास्ते में ही धोखा दे गयी।  चढ़ाई शायद स्वर्ग के लिए ही बनी थी।  इस बार तो  मयंक, अतुल,  पीयूष, मुकुल बहुत ज्यादा ही थकने लगे।  हर 100 कदम पर रुकना पड़ रहा था।  पीयूष को चक्कर आ रहे थे।  अतुल भी टूट चूका था लेकिन इन सबमे नितिन काहेरा सबसे मुस्तैद था।  पुरे बम लाहिरी एक्सपीडिशन की बागडोर उसके हाथ में थी।  सबका ख्याल रखना था।  क्योंकि यहाँ  कभी भी तबियत बहुत तेजी से खराब हो सकती थी।  अब 2 घंटे लंगड़ाते – हाँफते रुकते रुकते टीम पहुँच  गयी अली  बुग्याल।  एक बेहद ही खूबसूरत जगह । जहाँ पहुंचकर थकान जैसे रफूचक्कर हो गयी।  बुग्याल पहाड़ों में एक हरे मैदान को कहते हैं जहाँ मवेशी चारा चरते हैं।  यहाँ  भी एक एक कप चाय और थोड़ा खाना खाया और फिर 5 किलोमीटर का सफर तय कर ये लोग पहुंचे बेदिनी बुग्याल।  वाह।  दिन तो चले तो शाम को पहुंचे बेदनी लेकिन जो नज़ारा था वो बेशकीमती और आनंदित करनेवाला था।  अब टेंट गाड़ दिए गए।

रात को तारे जैसे ज़मीन पर आ गए।  लेकिन त्रिशूल पर्वत से बर्फीली हवाएं भी आ रहीं थीं।  टेंट्स पर पाला पड़ने लगा।  -5  रात को तापमान गिर गया।  हर कोई एक दूसरे की गर्माइश में दुबके पड़े थे।  पूरे  दिन की थकान ने अपना काम कर दिया था।  किसी को होश नहीं।  सब जैसे मर से गए।  लेकिन सुबह 4 बजे उठ भी गए।  लेकिन रास्ता अपना काम कर चुका था।  पीयूष ने बेदिनी से  लौटने का फैसला ले लिया।  अतुल भी हताश था।  लेकिन अतुल ने थोड़ा आगे बढ़ने फैसला किया।  भगवान् शिव और लाटू देवता के मंदिर के दर्शन कर टीम एक बार फिर चलने लगीं। इस बार नचौनी पत्थर पहुंचना था।  टेंट साथ  ले लिए।  बेहद खड़ी चढ़ाई शुरू हो गयी।  यहाँ अतुल का होंसला टूट गया।  मयंक और बाकी ट्रेकर्स भी होंसला छोड़ चुके थे।  10 मीटर भी भारी पड़ रहा था।  चक्कर आने शुरू हो गए थे।  सांस जैसे आना बंद हो गई।  अब ऑक्सीजन सिलिंडर की जरुरत थी लेकिन वो कहीं नहीं था।  मयंक बोला वापस चलो – अतुल बोला अब रहने दो।  रगड़  रगड़कर किसी तरह पहुँच गए नौचनी पत्थर।  अब अतुल ने कहा बस मैं यही रुकूंगा, नहीं तो मर जाऊंगा।  हालाँकि मन तो सबका यही था लेकिन एक्सपीडिशन को जारी रखना था।  अतुल के लिए टेंट लगा दिया और बाकी लोग बग्बासा के लिए निकल पड़े।

ऐसा लग रहा था मानो चढ़ाई ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है।  जैसे ही थोड़ा ऊपर बढ़ें दूसरी चढ़ाई इंतज़ार कर रही होती थी।  मयंक को थकान के साथ साथ हल्लुसिनेशन्स होने लगे।  उसके दिमाग ने  काम करना जैसे बंद दिया।  मुकुल को बुखार चढ़ने लगा।  नितिन 5000 मीटर की ऊंचाई पर अकेला और हताश महसूस करने लगा।  लेकिन इतनी दूर आकर लौटना हार होती इसीलिए उसने दोनों  संभाला और थोड़ी दूर गणेश मंदिर लेकर पहुंचा।  कालू विनायक मंदिर में  देर आराम किया और सांस वापस आने तक वही ध्यान भी किया।  थोड़ी देर सुस्ताने के बाद ये बागबासा के लिए निकले और कुछ सीधे रास्ते ने इन्हे आराम दिया।  हालाँकि बग्बासा में लोगों ने इन्हे आगे बढ़ने से रोका लेकिन इन्होने हिम्मत दिखाई  और रूपकुंड के लिए चल पड़े।

लेकिन कभी कभी लोकल लोगों की बात मान लेनी चाहिए।  खैर वहां से अब एक ऐसा रास्ता शुरू हुआ जो कि रास्ता ही नहीं था। पतली डगर और बजरी से भरा रास्ता।  5100 मीटर की ऊंचाई – सांस अब आनी बंद हो गयी मुकुल की।  वो बैठ गया और अब समझ  से परे था कि अब क्या करें।  नितिन काहेरा ने बागबासा लौटने का फैसला किया।  टीम लौट आयी।  लेकिन हौंसले नितिन के बुलंद थे।  रात को – 6 तापमान था।

सुबह जल्दी उठे और फिर चल दिए रूपकुंड के लिए।  इस बार एक लोकल गाइड को साथ लिया।  लेकिन चढ़ाई उतनी ही कठोर थी – एक चट्टान  ऐसी थी जिसके पार देखना मुश्किल था जिसपर चढ़ना मौत को बुलाने जैसा था।  लेकिन इस बार करना या मरना था सो कर ही लिया। आख़िरकार टीम बम लाहिरी पहुँच गयी रूप कुंड।  नितिन काहेरा ने 3 दिन में रूपदंड को फ़तेह कर लिया।  लेकिन उसे ये समझ आया कि  यहाँ कुछ है जो अदृश्य है और उसके सामने नतमस्तक होना जरुरी है।   रूपकुंड पर त्रिशूल पर्वत और शिव मंदिर के दर्शन कर टीम शकुशल वान लौट आयी।

 

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *