चमत्कारों से भरे से सोम्बरी बाबा 

नई दिल्ली । धीमी धीमी बारिश की बूँदें जीप के फ्रंट ग्लास पर पड़ रहीं थीं।  हिमालय में तब ठण्ड  और भी ज्यादा हो जाती है जब बारिश मौसम में नमी पैदा कर देती है।  हम लोग भवाली के पास कैंची धाम से नीम करोली बाबा के दर्शन कर निकले ही थे कि अचानक मौसम ने करवट ली।  पहली बार काकड़ीघाट जा रहे थे। बहुत सुना था इस ख़ास जगह के विषय में कि एक बेहद निराले और सिद्ध संत सोम्बरी बाबा – गुडरी महाराज के साथ रहा करते थे।  स्वामी राम अपनी किताब में लिखते हैं कि सोमबरी महाराज बेहद फक्कड़ लेकिन पञ्च अग्नि सिद्ध संत थे।  उनकी सिद्धि और पहुँच इस बात से लगायी जा सकती है कि हैड़ाखान बाबा, गुडरी महाराज, नानतिन बाबा, स्वामी विवेकानंद, बाबा नीम करोली महाराज उनके दर्शन को जाया करते थे।

स्वामी राम लिखते हैं कि पूरे हिमालय में पञ्च अग्नि सिद्धि शायद ही किसी और संत के पास हो।  जब स्वामी राम सोमबरी बाबा से मिले तो गुरु ज्ञान में बाबा ने उन्हें बताया कि पूरा ब्रह्माण्ड अग्नि से चलता है।  पूरा शरीर अग्नि से चलायमान है।  यदि जथा अग्नि न हो तो शरीर काम ही नहीं कर सकता है ऐसे ही बहुत से अग्नियां पूरे संसार को चलायमान रखे हुए है।  स्वामी राम बताते हैं कि सोमबरी बाबा का धुना कभी नहीं बुझता था उसमे अग्नि जलती ही रहती थी।   जब स्वामी राम ने उन्हें अग्नि में खड़े देखा तो वो चौंक गए।  इस पर सोम्बरी महाराज बोले कि मैं स्वयं अग्नि हूँ तो भला अग्नि कैसे मुझे जला सकती है।

बहुत सुना था सोमबरी बाबा के विषय में।  हालाँकि वो दयालु थे लेकिन जब बहुत ज्यादा तंग करते तो उन्हें गुस्से से भगा भी देते थे। कभी कभी लोग उन्हें दुर्वासा यानी गुस्सैल भी कहा करते थे।  लेकिन हर सोमवार को वो भंडारा भी किया करते थे।  एक छोटा सा बर्तन हुआ करता था उनके पास जिसमें खाना कभी खत्म ही नहीं होता था।  ये प्रमाणित था कि चाहे 100 लोग आएं या फिर 1000 भोजन सबको पूरा ही मिला करता था।  यहाँ तक कि हिमालय की जड़ी बूटियों से बाबा आसपास और दूरदराज से आये लोगों का इलाज भी किया करते थे।

खैर चलते चलते थोड़ा वक़्त बीत गया और मन में आया की बाबा की कुटिया में खाली हाथ जाना शायद ठीक नहीं।  सोमबरी बाबा की मछलियों के लिए आटा ले लिया और बाबा के धूने के लिए एक लोहे का चिमटा।  शायद मन में एक एहसास था की ‘मैं ‘ बाबा के लिए कुछ लेकर जा रहा हूँ।  मैं एक अहंकार है। जैसे ही काकड़ीघाट बाबा के घर पहुंचा तो आश्रम के केयरटेकर ने कहा की चिमटे को नदी में धो लाओ और मछलियों को खाना डाल दो।  मैंने और टोनी ने ऐसा ही किया।  जबत क मछलियों को भोजन कराया तब तक चिमटे को पानी में ही रखा।  हैरानी की बात ये रही कि जैसे ही पानी से चिमटा निकालने की कोशिश की तो लगा मानो वो और धंस गया हो।  बड़ी मुश्किल से जैसे तैसे चिमटे को पानी से बाहर निकला तो महसूस किया कि चिमटे का वजन इतना ज्यादा हो गया की मानो हाथ  छूट  जायेगा।

नदी से सोम्बरी बाबा की कुटिया कुछ 100 मीटर होगी लेकिन  ऐसा लगा मानो उस चिमटे के वजन के  साथ वो सफर तय ही नहीं हो पायेगा।  लेकिन जैसे सोम्बरी बाबा को मुझ पर तरस आ गया।  मैंने मन ही मन उनसे माफ़ी मांगी और कहा कि सब आप ही करते हो मुझे माफ़ कर दो।

 

शायद ये कहने भर की ही देरी थी कि चिमटा पहले जैसा हल्का हो गया  और मैं कुटिया तक पहुँच गया।  दंडवत प्रणाम किया और आज्ञा लेकर चिमटे को धूने के पास रख दिया।  आश्रम के केयरटेकर आनंद ने कहा कि ये सोम्बरी बाबा की मछलियां है इन्हे सब पता है।  प्रेम से जो करोगे सिद्ध होगा नहीं तो बाबा से दूर ही रहोगे।

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