दिल्ली में कहां है ब्रह्मस्थान ?

नई दिल्ली । बहुत दिन से मन में विचार चल रहा था। कोई कारण होगा कि नारायण बाबा को नीम करोली बाबा ने महरौली में एक गुप्त स्थान पर बैठाया।  एक ऐसे  हनुमान जी की सेवा दी जो कि एक पेड़ के नीचे विराजमान हैं और नारायण बाबा ने भी जुगल किशोर बिरला की नौकरी छोड़कर इस जंगल में रहना स्वीकार किया। 60 के दशक में दिल्ली के बिरला मंदिर में रामायण पाठ करने के लिए उन्हें 350 रुपए मिला करते थे।  उस वक़्त महरौली एक घने जंगल से  घिरा इलाका था।  जब पहली बार नारायण बाबा से मिला था तो उन्होंने बड़े प्रेम से चाय पिलाई थी और जब उनकी कुटिया पर नीम करोली बाबा का नाम देखा तो मन में श्रद्धा गहरी हो गयी।  लेकिन पहले दिन से उन्होंने कहा कि ये गुप्त मंदिर है  तो सवाल उठने लाजमी है कि क्यों ?

बहुत साल से बाबा से पूछता रहा कि क्या राज है लेकिन बाबा मुस्कुराते हुए कहते रहे कि सब बातें जानना जरुरी नहीं है।  लेकिन एक दिन बोले कि ये समझना जरुरी है कि मेहरौली एक दिव्य स्थान है या यूँ कहें कि ब्रह्मस्थान है।  क्योंकि जब कृष्ण का जन्म हुआ तो साथ ही उनकी बहन योगमाया का भी जन्म हुआ।  योगमाया ने ही कृष्ण के जन्म की पुष्टि की थी।  उसके बाद वो अंतर्ध्यान हो गयीं और उसके बाद योगमाया का मंदिर मेहरौली में बनाया गया।  कहते हैं कि ये मंदिर लगभग 5000 साल पुराना है जहाँ  आज भी पूजा होती है।  हालाँकि, महमूद ग़ज़नी ने इस मंदिर पर आक्रमण किया और इसे नुकसान भी पहुँचाया लेकिन हेमू ने इस मंदिर को दोबारा जीवित किया। उसके बाद लाला सेठमल ने अकबर के ज़माने में इसके रखरखाव पर ध्यान दिया।  कहते हैं कि अकबर की एक रानी को योगमाया ने सपने में दर्शन दिए और उनकी मन्नत जब पूरी हुयी तो उन्होंने योगमाया पर फूलों के पंखे भी चढ़ाये और साथ ही महरौली की प्रसिद्ध बख़ितयार काकी की दरगाह पर भी।  फूल वालों की सैर के दौरान इन दोनों जगह पर दिल्ली के उपराज्यपाल आज भी पंखे भेजते हैं।

नारायण बाबा बताते हैं कि महरौली को योगिनीपुर भी कहते हैं।  जैन तपस्वियों ने यहीं आकर तप किया और यहीं 800 साल पुराना जैन दादा बाड़ी मंदिर भी है। दरसल एक सिद्ध जैन तपस्वी मणिधारी जिनचन्द्र सूरी जी ने कुछ वक़्त महरौली (योगिनीपुर ) में बिताया।  वो बाल साधु थे और बेहद चमत्कारी।  लेकिन २६ वर्ष की आयु में उन्होंने महरौली में प्राण त्याग दिए।  उस वक़्त के राजा मदनपाल ने उनकी चिता की व्यवस्था आज के जैन दादा बाड़ी में की।  तब से ये सिद्ध स्थान है क्योंकि जिनचन्द्र हिन्दू, मुस्लिम, जैन, और बाकी सभी लोगों के लिए अपने द्वार खुले रखते थे और आज भी मंदिर के द्वार सभी लोगों के लिए खुले हैं।

 

 

लगभग 1000 साल पहले सूफियों ने मेहरौली को अपनी इबादत की जगह बनायीं।  सबसे पहले क़ुतुब्दीन बख़ितयार काकी ने यहाँ सूफ़ियत की नींव डाली। उसके बाद जमाली कमाली ने भी मेहरौली के माहौल को रूहानी किया।  आज भी लाखों लोग काकी की दरगाह पर आते हैं।

 

मौजूदा काल में संत बाबा नागपाल जैसे बड़े संत भी महरौली जैसे ब्रह्मस्थान में अवतरित हुए।  छत्तरपुर जैसे एक विशाल मंदिर का निर्माण बिना शक्ति के आशीर्वाद के संभव नहीं।  नारायण बाबा के मुताबिक संत नागपाल बाबा श्री विद्या में निपुण थे जिसकी वजह से मंदिर के एक पहलू को श्री यन्त्र का रूप दिया गया है।  ये इस बात का संकेत हैं कि योगिनीपुर नाम ऐसे ही नहीं दिया गया है। यहाँ शक्ति की उपासना होती रही है।  तभी योगमाया और श्री यन्त्र या आद्याकातायनी मंदिर का निर्माण हुआ है और महमूद ग़ज़नी के हमले से पहले 26 मंदिरों का एक समूह यहाँ था और साथ ही  स्तम्भ भी उन्ही मंदिर परिसर में स्थापित किया गया।

 

जवाब थोड़ा मिला कि महरौली एक आम इलाका नहीं है।  यहाँ शक्ति की उपसना होती रही है। गुप्त तरीके से तभी इसे योगिनीपुर कहा गया।  हालाँकि ये नाम भी अब गुप्त ही है।

 

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