जहां रात कोई नहीं रुकता, दिलचस्प कहानी

कोरिया (छत्तीसगढ़) जिले में धार्मिक आस्था के कई ऐसे स्थल मौजूद है, जिनकी पहचान अभी तक आम लोगों को नहीं हो पाई है। जिले के भरतपुर तहसील क्षेत्र में ही एक ऐसा धार्मिक आस्था का केंद्र है, जिसकी प्रसिद्धि भले ही कोरिया जिले मे न हो लेकिन सरहदी प्रदेश मप्र के कई क्षेत्रों तक फैली हुई है। यहां ऐसा ही एक धार्मिक आस्था के केंद्र गजमोंगरा बाबा का वर्षो पुराना मंदिर है।

इस मंदिर के नाम को लेकर यहां के पुजारी वेद प्रकाश बताते है कि गज का मतलब बडा और मोंगरा का मतलब टूटा हुआ और भोले बाबा के नाम को जोडकर गजमोंगरा बाबा धाम के नाम से यह केन्द्र प्रसिद्ध है। हर संक्रांति पर विशाल मेले का आयोजन होता है। भरतपुर जनपद के ग्राम जमथान में गजमांगरा नाले के किनारे स्थित विशाल चट्टान पर बने शिव मंदिर को गजमोंगरा के नाम से जाना जाता है। बताते है कि यहां के जंगल से बांस निकालने में लगे ठेकेदार बाल किशनदास ने वर्ष 1963 में मंदिर का निर्माण करवाया।

मंदिर बनवाने के पीछे भी बडी दिलचस्प कहानी है। बताया जाता है कि उन दिनों मप्र के सतना के रहने वाले एक ठेकेदार बालकिशनदास यहां से बांस कटवाकर ले जाने का काम किया करते थे। तब शिव जी की मूर्ति एक गढ्ढे में रखी रहती थी, हलांकि आते जाते वो उनकी पूजा किया करते थे, एक बार बांस से लदा उनका ट्रक का डीजल खत्म हो गया और घनघोर जंगल में कोई मदद करने वाला सामने नहीं आया, फिर ठेकेदार ने बाबा को याद किया और कहा कि यदि वो यहां से अपने ट्रक को सकुशल निकाल लेता है तो वो उनका मंदिर बनवाएगा। बाद में बंद ट्रक चालू हुआ और ठेकेदार को उसकी मंजिल पर पहुंचाया, जिसके बाद ठेकेदार ने मंदिर का निर्माण बडी और विशाल चट्टान पर करवाया। ठेकेदार बाल किशनदास की कोई संतान नहीं थी, और मंदिर निर्माण होते उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तब से लेकर आज तक इस मंदिर में आराधना करने वालों की कमी नही है। क्षेत्रीय स्तर के लोगों के अलावा ज्यादा संख्या में मप्र के विभिन्न क्षेत्रों के श्रद्धालुगण इस मंदिर तक अपनी मनोकामना लेकर आते है। मान्यता यह है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से जिसके लिए कामना करता है वह पूरा हो जाता है। ग्रामीणों की मानें तो जिनके संतान नही है वैसे श्रद्धालु सबसे ज्यादा आते है। कई लोगों की इस तरह की मन्नत पूरा होने के कारण आस्था और बढती गयी। यही कारण है कि आज की स्थिति में इस मंदिर में पूजा अर्चना करने वालों की संख्या काफी ज्यादा रहती है। विशेष अवसरों में तो भीड़ रहती ही है सामान्य दिनों में भी यहॉ श्रद्धालुगण पहुंचते ही रहते है।

कोई नहीं रूकता है यहां रात 

गजमोंगरा बाबा के दरबार में रात रूकने की मनाही है, कोई भी आज तक पूरी रात नहीं रूक सका है, हलांकि कई लोगों ने यहां रात रुकने की कोशिश की, परन्तु जैसे जैसे रात बढ़ती जाती है, यहां रूकने वालों को उस जगह से जाने को मजबूर होना पडता है। यहां के पुजारी बतात है, रात 12 से 3 यहां कोई नहीं रूक सकता है। किसी के साथ कोई हादसा नहीं हुआ, परन्तु उस दौरान रूक पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

भोले समझोगे तो ठीक

गजमोंगरा बाबा पर विराजमान शिव के लिंग कब से यहां है यह कोई नहीं जानता है। आने जाने वाले भाले समझ कर गोदी में उठा लिया करते है, कोई इन्हें नीचे ले जाकर स्नान करा लिया करता था, परन्तु यदि मन से भगवान मान जोश के साथ उठाने का प्रयास किया तो शिवलिंग को टस से मस करना मुमकिन हो जाता है। ऐसा कई बार देखा गया है, बताया जाता है कि 60 के दशक में गढ्ढे में रखे इस शिवलिंग को कैलाश मंदिर ले जाने की कोशिश तब के तत्कालीन रेंजर ने की। पहले जब शिवलिंग नहीं उठ सके, तो उसे हाथी से उठवाया गया, बाद में हाथी भार नहीं उठा सका और वो खुद ही बैठ गया। जिसके बाद से शिवलिंग यही विराजमान है।

चट्टानों की मोटी तह के उपर बना है मंदिर

गजमोगरा के जिस नाला के पास शिव मंदिर का निर्माण कराया गया है वह भी अपने आप में अनोखा है। नाला किनारे मोटी तह की चट्टान है जिसे कांग्रेस उपाध्यक्ष गुलाब कमरो ने उपर से बराबर करवाया है, उसी चट्टान के उपर में मंदिर का निर्माण कराया गया था। इसकी जानकारी कोरिया जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर व इस क्षेत्र के कई प्रमुख जगहों के लोगों को इसके बारे में जानकारी नही होने के कारण ऐसे धार्मिक स्थल पर नही जा पाता है इस क्षेत्र के लिए गुमनाम बना हुआ है। मंदिर के पास ही नाला के बीच में पांच छः फुट उॅची और चौड़ी चट्टान है। जो देखने में शिवलिंग का आकार दिखाई देता है। नाला के किनारे से इस शिवलिंग के आकार के चट्टान तक पहुंचने के लिए पुल बना दिया गया है। शिवलिंग आकार के चट्टान में उपर शिवलिंग स्थापित की गयी है।

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