बिल्लिगिरिरंगा की एक खौफनाक रात 

नई दिल्ली । बैंगलोर पहुँचते ही  रमेश मुनियप्पा भैया ने बिल्लिगिरि हिल्स की चर्चा की।  मैसूरु पहुंचते ही पहले तो चामुंडी हिल्स पर चामुंडी मंदिर के दर्शन किये।  फिर रमेश भैया हमें लेकर चले बी आर हिल्स की तरफ चल दिए।  बी आर हिल्स ईस्टर्न और वेस्टर्न घाट्स के बीच में पड़ता है और भारत की सबसे शानदार बायो डाइवर्सिटी का प्रतीक भी है।  यहाँ देश की सबसे ज्यादा वन्य प्राणियों और वनस्पति की किस्मे पायी जातीं हैं।  दोपहर बाद चले थे तो शाम पांच बजे तक बिल्लिगिरि रंगा टाइगर रिज़र्व के गेट तक पहुँच गए।  गॉर्ड ने कहा की हाथियों ने आगे रास्ता रोका हुआ है इसीलिए अगर कुछ देर रुक कर जाएँ तो अच्छा होगा।  उनके मुताबक करीब 100 हाथियों को बड़ा झुण्ड रास्ते में ही खड़ा है और इतने  बड़े झुण्ड से कम हमला हो जाये कहना मुश्किल है।  रमेश भैया की दीदी ने भी समझाया की जब तक हाथी रास्ता न छोड़ ने उनका सामना करना ठीक नहीं है।
आधे घंटे बात वायरलेस मैसेज आया की हाथी चले गए हैं और सफर करना अब सुरक्षित है।  दीदी बिल्लिगिरिरंगा की नस नस से वाकिफ है।  30 साल अपनी ज़िन्दगी के उन्होंने सोलिग आदिवासियों को दिए हैं।  वो और डॉक्टर सुदर्शन ने आदिवासियों के लिए स्कूल, हॉस्पिटल और हायर एजुकेशन के लिए संसथान खोले हुए हैं।  खैर चेक पोस्ट से आगे बढ़कर करीब 10 किलोमीटर आये ही थे की जंगल में हाथियों के चिंघाड़ने की आवाज़े आने लगीं।  दीदी ने कहा की रात होने को हो इसीलिए जल्द से जल्द कॉटेज पहुंचना जरुरी है  नहीं तो जंगल में कुछ भी हो सकता है।  दीदी की इस बात से थोड़ा डर लगा क्योंकि अगर उन्होंने कुछ कहा है  जरूर कोई बात होगी।  खैर हम उस वक़्त करीब 6 लोग थे।  फिर  भी टोनी ने दीदी से पूछ ही लिया क्या हाथियों का डर है।  दीदी चुप्प रहीं और फिर  कुछ सोचकर कहा की जंगल वीरान होता है और जंगल के बारे में कुछ  भी नहीं कहा जा सकता।  यहाँ कुछ अनदेखे अनचाहे पहलु भी होते हैं।  दीदी का इतना कहना शरीर में सिरहन दौड़ाने के लिए काफी था।
यकीन जानिये सन्नाटा या अटूट शान्ति किसी भी शहरी आदमी को पागल कर सकती है।  और सच में बी आर हिल्स में सन्नाटा इतना ज्यादा था की एक बार सन्नाटा शब्द भी फीका लगे।  एक अकेली गाडी जंगल में दौड़ी जा रही थी।  कुछ 20 किलोमीटर बाद एक गेट आया।  दीदी ने उतरकर गेट खोला और गाडी अंदर गयी।  उतरकर दीदी अँधेरे में जैसे गायब सी हो गयीं।  हम लोग जैसे अनाथ बच्चों की तरह खड़े से रह गए।  दूर से उन्होंने आवाज लगायी और रमेश भैया हमें लेकर चल दिए।  गाडी से दीदी का कॉटेज ज्यादा दूर नहीं था लेकिन अँधेरे इतना ज्यादा था की कुछ नज़र आना नामुमकिन सा था।  खैर एक बेहद खूबसूरत कॉटेज का दरवाजा खुला था और दीदी ने इतनी देर में चाय का पानी रख दिया था।  कॉटेज के बाहर एक छोटी सी बालकनी जैसी थी जिसमे हम सब बैठ गए।  चाय से पहले वहां नज़ारा इतना ज़बरदस्त था की यकीन करना मुश्किल था की ये जगह भारत में थी।  हज़ारों जुगनू आसमान में जैसे तैर रहे थे। ये नज़ारा  कर रहा था।  दीदी की चाय भी तैयार थी।
चाय के साथ कुछ खाकर हम चल दिए गेस्ट हाउस की तरफ।  दीदी आगे आगे और हम पीछे पीछे।  सन्नाटे को चीरते हुए हम गेस्ट हाउस पहुँच गए।  एक दो मंज़िला ईमारत थी ये।  जैसे जंगल में कोई वाच टावर हो।  दीदी ने ताला खोल दिया और बोला रात में बाहर नहीं आना।  सुबह मिलेंगे।  और बोलीं हाथी  सकते हैं लेकिन डरना नहीं। डरने के लिए उनका इतना कहना ही काफी था।  रमेश भैया और टोनी ग्राउंड फ्लोर पर सो गए और मैं  और अरुण फर्स्ट फ्लोर चले गए।  देर रात तक इस शानदार जगह की चर्चा चलती रही।  कुछ देर बाद अरुण थकान से सो गए लेकिन न जाने मुझे नींद क्यों नहीं आयी।  जंगल हमेशा से आकर्षित करता रहा है मुझे और वाइल्डलाइफ को नजदीक से देखने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता।  चूँकि जंगल रात को सबसे ज्यादा सक्रीय होता है इसीलिए भी जगा रहा शायद।
दिमाग में टाइगर, लेपर्ड और हाथियों का ख़याल तेजी से चल रहा था।  लेकिन इनकी कोई सुगबुहाट नहीं लेकिन एक आवाज कान में पड़ी – छम्म छम्म।  जैसे किसी के
पाँव की पायल।  तुरंत घडी की पर नज़र पड़ी।  रात के दो बजे थे।  इस वक़्त कोई महिला या आदिवासी यहाँ क्या कर रही होगी।  इसी बीच छम्म छम्म की आवाजें दोबारा आने लगीं।  इतने सन्नाटे में पायल की आवाजें पागल कर देने वाली थीं।  आवाज तेज हो रही थीं और लगातार आ रहीं  जैसे कोई औरत जंगल के चक्कर लगा रही हो।  आवाज सुनते सुनते दीदी की बातें कान में गुजने लगीं की जंगल में बहुत कुछ अनचाहा और अनदेखा भी होता है।  और उन्होंने  कहा था की घर से बाहर नहीं निकलना।  छम्म छम्म की वो आवाज पागल कर रही थी। मन में  बहुत से ख्याल आने लगे की क्या कोई भूत चुड़ैल का फेरा है।  क्या वो इस घर में भी आ सकती है।  डर लगने  लगा इस ख्याल से की अगर मुलाकात हो गयी तो क्या होगा।  बहुत हिम्मत कर खिड़की तक गया और बाहर झाँका लेकिन कुछ दिखाई नहीं दिया।  आवाज बदस्तूर जारी थी।  खिड़की के शीशे में अपनी ही परछाई देखकर डर गया।  दूर कहीं एक अजीबो गरीब आवाज ने छम्म छम्म की इस आवाज को धीमा किया।
घडी पर नज़र पड़ी तो सुबह के 4 बज चुके थे।  नींद तो आँखों में नहीं थी लेकिन थकान से  शरीर सो चूका था।  जंगल की इस खौफनाक रात में नींद कब आयी पता ही नहीं चला।  सुबह से आँख खुलीं तो लगा जैसे रात कोई डरावना सपना देखा था।  लेकिन वो एक अनुभव था जिसका कोई प्रमाण नहीं था।

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