एक खतरनाक खेल है कोडियाला सफारी

 

नई दिल्ली। आसमान में चाँद था तो उसकी रौशनी से कुछ दूर तक देखा जा सकता था। लेकिन दिसंबर की ठण्ड हड्डी फोड़ने वाली थी। रात के करीब 1 बजे का वक़्त था। गाडी की गरमाई से उतरने की इच्छा भी नहीं थी लेकिन अब कुछ आराम चाहिए था एक लम्बे सफर के बाद। कौडियाला ऋषिकेश से करीब 50 किलोमीटर दूर एक ऐसा गांव है जहाँ एक रहस्य्मयी नदी बहती है और जहाँ बाघों का साम्राज्य है। हम तीन लोग थे। गाडी से उतरकर पहले तो जंगली कुत्तों को भगाया और फिर चल पड़े एक पतली से पगडण्डी पर। जैसे जैसे आगे बढे हाथ जैसे बर्फ हो गए और थोड़ी देर में सुन्न पड़ गए। लेकिन लौटने के कोई विकल्प न था। बस चलते जाना था। मौत से ज्यादा डर ठण्ड से मर जाने का था। खैर किसी तरह से कैंप पहुँच गए और सीधे रजाई में घुस गए।

रातभर दूर हिमालय में कहीं हिरण रह रह कर पुकार लगा रहा था। कैंप में इस बात कर डर था की इलाके में बहुत से बाघ हैं और हो सकता है की एक आध कैंप के पास तक आ गया हो। खैर अब कर भी क्या सकते थे सिवाय ईश्वर को याद करने के। रात किसी तरह बीती भोर फटी तो कुछ राहत हुयी। मोर बोलने लगे और चिड़ियाओं के शोर ने माहौल में रौनक पैदा कर दी थी। घना जंगल था और हमारा कैंप एक बेहद रहस्यमयी नदी के ऊपर था। सुबह सुबह नवीन आ गया और उसने कहा की चलो मॉर्निंग वॉक पर नदी चलते हैं। गोल गोल पत्थरों पर चलना शुरू कर दिया। करीब एक किलोमीटर दूर आ गए लेकिन पानी के दर्शन नहीं हुए। आखिर मैंने पूछ ही लिया की नदी कहाँ ? नवीन मुस्कुरा कर बोला की भाई जी नदी के ऊपर ही तो आप चल रहे हो। दरसल ये एक अनोखी नदी थी जो कुछ दूर तो ऊपर चलती है और उसके बाद धरती में गायब हो जाती है। थोड़ी दूर चले तो पानी बहता हुआ दिखाई दिया। इस रहस्य पर हज़ारों साल से पर्दा पड़ा है की आखिर कौडियाला की नदी अचानक धरती में कैसे घुसकर गायब हो जाती है और फिर दूर गंगा जी में जाकर मिलती है। घने जंगल में ऐसा रहस्य आज तक नहीं देखा था। नदी के साथ साथ चलते हुए उन दर्रों को करीब से देखा जहाँ से ये नदी गायब हो रही थी लेकिन कुछ समझ नहीं आया।

कुछ गड़रिये भेड़ चराते हुए आ गए। और बहुत सी महिलाये घास काटने के लिए वहां से निकल रहीं थीं। वो बोलीं की बिना सोचे समझे आ गए हो यहाँ। उनके मुताबिक वन देवता को नमस्कार किये बिना कौडियाला आना मौत को दावत देना है। सुनकर मैंने उनसे पूछ ही लिया क्यों। बोलीं ये नदी वन देवता की है तभी तो आधी दिखाई देती है और आधी नहीं। उनमे से एक बोली की अगर देवता को याद नहीं किया तो जल्द ही बाघ से सामना होगा और उससे बच पाना बेहद मुश्किल होगा क्योंकि यहाँ बहुत से बाघ हैं। गडरियों ने कहा की उनकी बकरियों के शिकार को बाघ आते हैं और वो आसपास ही होंगे। सुनकर डर लगा और जंगल में हम पांच किलोमीटर अंदर थे। मोबाइल का सहारा नहीं था, भागने की जगह नहीं थी और गोल पत्थरों की वजह से चलना मुश्किल था। लेकिन एक ही चीज अच्छी थी की हमारे साथ गड़रिये थे।

खैर अब उनका सहारा था। हम थे कौडियाला टाइगर ट्रेल पर जहाँ हमारा सामना अब बाघ या तेंदुए से कभी भी हो सकता था। करीब 200 भेड़ें और बकरियां थीं। ये लोग इन्हे चराते हुए बद्रीनाथ से यहाँ तक थे और जब तक शिवालिक पर बर्फ नहीं पिघलेगी तब तक ये यहीं रहेंगे और बाघों से इनका आमना सामना होता रहेगा। चलते चलते हम थोड़े थक गए तो हमने एक बड़े से पत्थर का सहारा लिया। अभी बैठे ही थे की बकिरयों ने चिलाना शुरू कर दिया। और वो तेजी से इधर उधर भागने लगीं। एक गड़रिये ने तुरंत अपनी बन्दूक थाम ली तो दूसरों ने लाठी और खुखरी जैसे तेज हथियार निकाल लिए। बाघ अब कहीं बहुत करीब था। बन्दुक वाले गड़रिए ने हमे खुद के पीछे रहने को कहा। हम तीन लोग उसके पीछे खड़े हो गए। अब सभी गड़रिये बाघ के हमले का इंतज़ार कर रहे थे। हम लोगों की तो जैसे जान ख़त्म सी हो गयी लेकिन गड़रिये मजबूती से डटे थे उनके लिए ये रोज की दिनचर्या जैसा था। कोई अपनी जगह से हिला नहीं। जो जहाँ था वहीँ जमा रहा। न जाने किस और से हमला हो जाये।

अचानक 10 मिनट बाद एक बाघ बिजली की फुर्ती से जंगल से बाहर आया और एक बकरी को मुँह में दबाकर जंगल में भाग गया। गड़रिये कुछ नहीं कर पाए। थोड़ी हिम्मत कर हमने पुछा की गोली क्यों नहीं चलायी। वो बोले की बाघ जब बाहत गुस्से में शिकार करे तो उसे करने देने में ही सबकी भलाई है नहीं तो वो इंसानों पर भी हमला जो जाता है जोकि ज्यादा घातक साबित होता है। खेर बाघ ने सबकुछ इतना जल्दी किया की कुछ सम्भलते इससे पहले उसने अपना काम कर दिया था। लोग हज़ारों रुपया खर्च कर वाइल्डलाइफ पार्क्स जातें है और वैन कोई बाघ देखने को मिलता लेकिन कौडियाला के जंगलों में ये एक आम बात है।

 

कभी अगर बाघों से मिलने का मन हो तो कौडियाला में मिस्ट्री रिवर पर वाक करते करते आपको उसके दर्शन कभी भी हो सकते हैं। खेर गडरियों ने हमें जंगल से बाहर छोड़ा और हम कैंप पहुंच गए। और ऐसा लगा मनो एक नयी ज़िन्दगी मिली हो।

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