बाघों के बीच बाबा रामचंद्र दास

नई दिल्ली। सफ़ेद लम्बी दाढ़ी के बीच छोटी से मुस्कान किसी भी व्यक्ति को इस नागा साधु के प्रति आकर्षित कर सकती है। लेकिन इनसे मुलाकात एक बेहद घने जंगल में ही संभव है। बाघों, तेंदुए, सांप, बिच्छू भरे इस जंगल बाबा रामचंद्र दास एकदम अकेले रहते हैं। साल में लगभग 8 महीने ज़बरदस्त गर्मी रहती हैं और 4 महीने कड़ाके की ठण्ड । लेकिन नागा बाबा रामचंद्र दास को कोई फ़िक्र नहीं। उनके लिए सब जानवर और इंसान उनके बच्चे जैसे हैं।

दिल्ली से 200 किलोमीटर दूर सरिस्का टाइगर रिज़र्व के हनुमान मंदिर के द्वारपाल के तौर पर रह रहे हैं बाबा रामचंद्र दास।  76 साल के हो गए हैं और 40 साल से साधू हैं। इन चालीस सालों में मंगलवार और शनिवार को छोड़कर उन्हें जंगल में कभी कभार ही इंसानों से भेंट होती है। एक छोटी सी कुटिया में रहते हैं और राम राम जपते हैं।

जब उनसे पूछा कि आखिर इतने घने जंगल को अपना घर क्यों बनाया तो बोलते हैं कि इंसान बहुत शोर मचाते हैं, साधना में विध्न हैं। इंसानी बस्तियों में सिर्फ धोखा है जबकि जंगल आपको कभी धोखा नहीं देगा। अगर आप जंगल को अपना घर मानते हो तो न जाने जानवरों को भी ये पता चल जाता है नहीं तो 40 साल में कितनी ही बार बाघों से आमना सामना हुआ लेकिन एक भी उन्होंने हमला नहीं किया। कितनी ही बार तेंदुए हनुमान मंदिर की छत पर आ गए फिर भी कभी भिड़ंत नहीं हुयी।

बाबा रामचंद्र दास को चिलम का खासा शौक है। बात ख़त्म नहीं होती कि चिलम जल जाती है। बोलते हैं कि चिलम तो माई है हमेशा साथ रहती है। हनुमान मंदिर से सरिस्का टाइगर रिज़र्व का गेट लगभग 40 किलोमीटर दूर है। और रास्ता घने जंगल का है तो आखिर कैसे बाबा के पास खाना और बाकी सामान आता होगा।

अभी ये सवाल मन में चल ही रहे थे कि दो वन गुज्जर बहुत सी पूरियां, आलू की सब्जी और हलवा लेकर पहुँच गए। हम इससे पहले बाबा बोले कि हनुमान जी को सब पता है कि कौन कहाँ कब भूखा है। फिर उन गुज्जरों से कहा कि बच्चे शहर से आये हैं सारा खाना इन्हे ही दे दो। वो प्रसाद बेहद स्वाद था और उस वक़्त ये ख्याल आया कि एक जंगल में बैठा फकड़ साधू ने हमारा इतना ख्याल रखा कहीं हमें इतनी सेवा करनी पड़े तो शायद नहीं कर पाएंगे।

अभी खाना खाना शुरू ही किया था कि ज़ोर से आवाज आयी – अलख निरञ्जन। बाबा ने जवाब दिया – आदेश आदेश। कहकर कुटिया से बाहर गए और पाया कि नाथ संप्रदाय के बाबा जोगनाथ, मछेंद्रनाथ और सोमवारनाथ पधारेहैं।

दरसल इस घने जंगल के पास महाराजा भरतरी का मंदिर भी है और हज़ारों नाथ साधू हनुमान मंदिर भी आते हैं। बाबा ने तुरंत सबके लिए मिठाई परोसी और खाना सजा दिया। हम लोग इस प्रेम के साक्षी थे जहाँ एक जंगल में बिना किसी स्वार्थ के एक नागा सभी आने वालों की सेवा में लीन है।

मैंने पूछा बाबा इतनी सेवा क्यों ?बोले हनुमान जी महाराज सेवा के प्रतीक हैं – दर से कोई भूखा न जाए – एक रोटी है सबको बाँट दो चाहे इंसान हो या चिड़िया। प्रकृति माँ सबका ख्याल रखती है मैं सिर्फ उसका एक माध्यम  हूँ। मुझसे पहले भी बहुत थे और मेरे बाद  भी बहुत होंगे, प्रकृति की लीला चलती रहेगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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