जीने का सही मार्ग बम लाहिरी

नई दिल्ली। कभी एक दिन सिर्फ दिल्ली को गौर से देखो। दिल्ली ही क्यों मुंबई, बैंगलोर, चेन्नई पर भी गौर करो। दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर घंटा बिताओ। सिर्फ ये देखने के लिए आखिर लाखों लोगों की ये भीड़ कहाँ जा रही है, किस चीज की आपाधापी है। हर कोई एक दूसरे को बस रौंद रहा है। सिर्फ घंटा किसी फुटओवर ब्रिज पर बिताकर देखो – ये शहर किसी आग से खेल रहा जान पड़ता है।

एक होड़ सी है जिसमे अंत में लोग सिर्फ बीमार पड़ रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं। अस्पतालों के बिल बढ़ रहे हैं और अनदेखी परेशानियां घेरे हुए हैं। ऐसा लगता था कि नानक दुखिया सब संसार ख़ास दिल्ली के लिए गुरुनानक जी ने कहा था।

सबसे ज्यादा लोग जो परेशान हैं वो है दिमागी तौर से वो तक चुके हैं।लेकिन दिल दिमाग में जो जंग चल रही है उसे कोई डॉक्टर हल नहीं कर सकता। क्योंकि जो अंतःकरण में घट रहा है उस पर किसी का बस नहीं है। बच्चे थे तो फ़िक्र नहीं थी लेकिन अब लगता है जैसे सारे संसार की ज़िम्मेदारी हमारे सर पर है। प्रतिस्पर्धा है, जीना महंगा हो गया है और मरना भी आसान नहीं है। तो सवाल ये है कि क्या शहरी आदमी के विकल्प ख़त्म होते जा रहे हैं। बच्चों से बचपन छिन गया है क्योंकि हम सब भी तो इसी का हिस्सा हैं।

कहते हैं कि जब खुद को पाया तो जग पाया। अपने मन के हारे हार है और मन के माने जीत। तो कुछ लोगों ने हाथ मिलाया और दिल्ली से शुरुआत हुई एक ऐसे आंदोलन की जिसमें सिर्फ खुद को आंदोलित करना था।और ये सब फिटनेस गुरु टोनी, फ़िल्मकार कपिल कुमार,  वास्तु शास्त्री अरुण जैन, समाज सेवी रमेश मुनियप्पा, आई टी एक्सपर्ट सचिन कटोच और क्रिया योगी बाबा ब्रह्मचारी नर्मदा शंकर ने बम लाहिरी को आकर दिया। कोशिश थी कि लोगों को शहर से बाहर ले जाकर ध्यान, योग, फिटनेस और दिमाग को शांत किया जाये।

बाबा ब्रह्मचारी नर्मदा शंकर एक मैकेनिकल इंजीनियर थे और उन्होंने यूरोप का जीवन छोड़कर गुफाओं में तप किया। बाहरी और अंदरूनी दुनिया को वो बहुत बारीकी से समझते हैं।क्रिया योगी हैं और गोरख आसन सिद्ध किया जिसमें 64 आसन और 24 मुद्राओं को एक में सिद्ध करना होता है। इंसानी दिमाग कैसे विचार शून्यता में जाये इसका रास्ता उन्हें पता है और जीवन को कर्म प्रधान बनाते हुए कैसे खुद की खोज की जाये इसका संतुलन बनाना उन्हें आता है।

दरअसल सारा खेल इस बात पर टिका है कि हम प्रकृति के साथ कैसे एक हो जाएँ। और ये मुश्किल नहीं है।

मेरे दोस्त रवि भंडारी का बेटा है आर्यन भंडारी। बेटे की समस्या ये थी कि वो बेहद चुपचाप रहता था। माता पिता के साथ भी बात नहीं करता था। रवि ने मुझसे कहा कि आप बम लाहिरी कैंप में आर्यन को लेकर जाओ क्योंकि वो बहुत से डॉक्टरों को देखा चूका है लेकिन आर्यन में बदलाव नहीं आया है। आर्यन को लेकर हम ऋषिकेश की और चल दिए क्योंकि उस वक़्त कैंप ब्यासी में था। पूरे रास्ते वो कुछ नहीं बोला। यहाँ तक कि खाने के लिए भी नहीं कहा।लेकिन जैसे ही हम ब्यासी कैंप पहुंचे आर्यन में खुद-ब-खुद ज़बरदस्त बदलाव आया। उसने जिम जाना शुरू कर दिया। दौड़ना शुरू कर दिया। बोलना शुरू कर दिया।

 

हैरान था कि कैसे महज आबोहवा बदलने से पूरा व्यक्तित्व ही बदल जाता है। हिमालय की हवा और कल कल बहती गंगा जी ने सब कुछ बदल दिया। ऐसा लगा कि मानो कोई कैदी आज़ाद हुआ हो। एक बड़ा बोझ हटा हो।आत्मा को उड़ान मिली हो।

 

 

 

 

 

 

 

 

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