हौंसले की परीक्षा है तुंगनाथ

नई दिल्ली।  31  दिसंबर 2016  का दिन था। देर रात पीपलकोटी से चोपता के लिए निकले। बद्रीनाथ के आसपास का ये इलाका थोड़ा डरवाना सा है। ऊंचाई बहुत ज्यादा है, पहाड़ियां कमजोर हैं और रास्ता संकरा है। पीपलकोटी से गोपेश्वर 40 किलोमीटर दूर है।

ठण्ड बहुत ज्यादा थी, इतनी की जूते फाड़कर अंदर घुस रही थी। कार के स्टेयरिंग को बिना गिलब्स के पकड़ना मुश्किल हो रहा था। रात धीरे धीरे गहराती जा रही थी। पहाड़ों की रात वैसे भी थोड़ी ज्यादा ही डराती है। रास्ते के किनारे मन्दाकिनी बह रही थी और आसमान इतना साफ़ था कि तारे ऐसे लग रहे थे कि मानो हाथ से छू सकते हों।

गोपेश्वर से चोपता तक सफर रात को हिम्मत और हौंसले का जैसे इम्तेहान सा है। क्योंकि इंसानी बस्ती गोपेश्वर में ख़त्म हो जातीं हैं और वहां से शुरू होता है एक सुनसान जंगल – केदारनाथ लेपर्ड सेंचुरी।

चोपता तक ये सफर कुछ 25 किलोमीटर का है। पूरे रास्ते एक ऐसा जंगल है जो इतना घना है कि धूप धरती को नहीं छुपाती । ऐसे जंगल की रात कैसी होगी, इसकी कल्पना आप कर सकते हो। जंगली जानवरों से मुलाकात कभी भी सकती थी और हुई भी।

केदारनाथ सेंचुरी में चले हुए अभी 10 किलोमीटर ही हुए होंगे कि एक तेंदुआ रोड पर आ गया। और जब तक वो सड़क पर है तब तक आप चल नहीं सकते। ये जंगल का कानून है। जब आप घाटी में हैं तो कुछ भी हो सकता है – जंगली जानवर और बहुत से ऐसे नज़ारे जो शायद इंसानों के लिए एक पहेली ही बने रहते हैं।

खैर रात 12 बजे हम चोपटा पहुंच गए। रात का तापमान -5 डिग्री था। दूर तक इंसानों का कोई नामो निशान नहीं था। हाथ – पैर सुन्न पड़ गए थे और कहीं सर छुपाने की कोई जगह नहीं थी। चाँद की रौशनी से कुछ नज़र आ रहा था। रात का एक एक लम्हा सर्दी की वजह से लम्बा हो रहा था। दूर एक रौशनी दिखाई पड़ी। हम कार लेकर वहां तक पहुँच गए। दरसल रौशनी एक लैंप की थी जो एक टेंट के बाहर जल रहा था।

हमने टेंट वाले से पूछा कि क्या रात बितायी जा सकती है क्योंकि सुबह तुंगनाथ की यात्रा करनी है। भले मानस ने अपना टेंट हमें दे दिया और हमने भोले का शुक्रिया अदा किया कि ऐसे हालत में भी उन्होंने ध्यान रखा। आप आस्तिक हो या भगवान में कम विश्वास रखते हों लेकिन जब तुंगनाथ में होते हो तब एक परम शक्ति का एहसास हो जाता है।

सुबह जब हुयी तो खिलखिलाती धूप ने जैसे स्वागत किया। दूर केदार घाटी में बर्फ से ढकी पहाड़ियां देखी जा सकती थी। ऐसा लगा मानो तुंगनाथ पुकार रहा हो। दरसल चोपता से तुंगनाथ करीब  10   किलोमीटर का पैदल रास्ता है। शुरू में ऐसा लगा कि बस सफर जल्द कट जाएगा लेकिन शिवत्व को पाना भला इतना आसान कहाँ। आधे किलोमीटर पर ही सांस जैसे उखड़ने लगी। और अभी तो सफर जैसे शुरू ही हुआ था।

तुंगनाथ शिव का सबसे ऊँचा मंदिर है। ये पांच केदार में से एक है और समुद्र तल से करीब 3700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। जैसे जैसे ऊपर चढ़ने लगे, सांसों की माला जैसे टूटने लगी। ठण्ड और सर्द हवाएं अब हौंसला तोड़ रही थीं। ठंडी हवाएं सीधे नाक से फेपड़ों तक पहुँच कर जिस्म को बर्फ सा कर रहीं थीं। घुटने जवाब दे रहे थे और मन कर रहा था कि ज़िन्दगी रही तो फिर कोशिश की जाएगी। इक्का दुक्का कोई व्यक्ति जो नीचे उतर रहा था वो हौंसला और तोड़ रहा था कि पहुंचना आसान नहीं है – सोच लो।

बीच रास्ते में एक बुगियाल पड़ा तो आराम मिला। अभी भी सफर बहुत था की अचानक काले बादल घिर आये। किसी ने कहा कि बर्फ गिरेगी। सुनकर लगा कि अब इससे ज्यादा मुसीबत और क्या कोई मांगे। सफर फिर शुरू किया।

गिरते पड़ते किसी तरफ आधे रास्ते पहुंचे की बर्फ गिरने लगी। पूरी कायनात जैसे बदल गयी और बर्फ धीरे धीरे कपड़ों पर जमने सी लगी। गलती ये हुयी कि इस हालत के लिए तैयारी नहीं की थी और छुपने की जगह भी नहीं थी। लेकिन गणेश मंदिर ने जैसे शरण दी। लेकिन तुंगनाथ अभी भी दूर था।

उस वक़्त शायद हम आखिरी लोग थे जो यात्रा कर रहे थे। और जब तुंगनाथ बर्फ से ढक जाता है तो यहाँ स्नो लेपर्ड देखे जा सकते हैं और बर्फीला भालू भी। आखिर इतनी सारी तकलीफों के बीच तुंगनाथ के दरवाजे पर पहुँच ही गए।

बाबा तुंगनाथ आराम मुद्रा में थे और उनके घर के दरवाजे बंद थे लेकिन ऐसा आनंद आया की लगा कि ज़िन्दगी रही तो एक बार फिर यहाँ जरूर आऊंगा। दूर तक फैली केदार घाटी थी – आकाश कुंड था और समाधी में नन्दी थे। दूर तक फैली शांति थी और किसी का बोलना भी कानों को अखर रहा था। ऐसा है बाबा तुंगनाथ का धाम

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