चार दिन दुनिया से कटे रहना आसान नहीं

नई दिल्ली । पीपलकोटी में शाम के पांच बज चुके थे  जब नितिन काहेरा और मयंक ने मद्महेश्वर के लिए यात्रा शुरू की। पीपलकोटी बद्रीनाथ से 70 किलोमीटर दूर है। ये पहाड़ियां रात को बेहद खतरनाक हो जातीं हैं क्योंकि रास्ते संकरे हैं और खाईयां गहरी हैं। पीपलकोटी से निकल कर सबसे पहले आया गोपेश्वर। गोपेश्वर के बाद इंसानी बस्तियां ख़त्म हो जातीं हैं। देर रात केदारनाथ टाइगर रिज़र्व से होते हुए करीब 10 बजे नितिन चोपता पहुंचा। रात को दूर दूर तक वहां कोई नहीं था।

सोचा की चलो रात ऊखीमठ में बितायी जाए जो कि 22 किलोमीटर दूर था। ठण्ड बेहद ज्यादा थी और भूख भी लग चुकी थीं। ऊखीमठ पहुँचते पहुंचते  1 बज चुके थे और कुत्तों के अलावा कोई और रास्ते में नहीं था। तो सोचा कि 30 किलोमीटर रांसी गांव में जाकर आराम किया जाये। मद्महेश्वर यात्रा से पहले रांसी आखिरी इंसानी बस्ती है। और यहाँ गाड़ी भी यहीं छूट जाती है। रात को सोने के लिए एक भले मानस ने अपने घर में जगह दे दी नहीं तो रात तारों की नीचे बितानी पड़ती।

सुबह उठे तो चारों तरफ बर्फ से ढकी पहाड़ियां थीं और दूर फैली ख़ामोशी। ऊंचाई इतनी थी कि हिमालयन ईगल आसमान में देखे जा सकते थे। मौसम एकदम साफ़ था और हौंसला बुलंद था। नितिन, मयंक और दो और दोस्तों ने यात्रा शुरू कर दी। शुरूआती रास्ता एकदम सीधा था। पास ही मधुगंगा बह रही थी – ऐसा लगा कि गंगोत्री के पास रहें जहाँ गंगा किसी दर्पण से भी ज्यादा साफ़ बहती है। मधुगंगा भी एकदम कांच जैसी थी – एक लकड़ी के पुल को पार किया और सफर शुरू हो गया। लगभग 2 किलोमीटर तक रास्ता सीधा और आसान रहा – नितिन को लगा कि अगर ऐसा है तो बहुत जल्द मद्महेश्वर सामने होगा।

नितिन एक ज़बरदस्त बास्केटबाल प्लेयर है और मयंक भी अच्छा ट्रेकर है।  2 किलोमीटर चलने के बाद ढलान आ गयी और गहरा जंगल शुरु हो गया। यहाँ तक सफर मजेदार था – हौंसला दे रहा था कि जैसा सोचा था वैसा नहीं था।  4 किलोमीटर चलने के बाद कुछ साधु मिले जो बाबा के दर्शन को जा रहे थे। सबने इनको आशीर्वाद दिया लेकिन कहा कि तेजी यहाँ ठीक नहीं। साधु कुछ थोड़े में सब कुछ बता गए कि मद्महेश्वर इतना भी आसान नहीं था।

बस जहाँ वो साधु मिले वहीँ से 12 किलोमीटर लम्बी खड़ी यात्रा शुरू हो गयी। तेज धूप – इतनी तेज कि आँखें खुल नहीं पा रहीं थीं – और सीधी चढ़ाई – इन दोनों बेहतरीन ट्रैकर्स के लिए अब मुश्किलें शुरू हो चुकीं थीं। हर 50 से 100 मीटर पर रुकना पड़ रहा था। धूप ताकत खींच रही थी और प्यास शरीर को शिथिल कर रही थी। हालाँकि, हर थोड़ी देर बाद झरने थे – पानी की कोई कमी नहीं थी बस शरीर से प्राण निकले नहीं थे। लेकिन इन दोनों ने हौंसला नहीं हारा। मद्महेश्वर पहुँचने की इच्छा शायद टूटन से ज्यादा मजबूत थी। ये लोग लगभग 3100 मीटर की ऊंचाई पर थे और यहाँ से वापस जाने का कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन अभी तो रास्ता सिर्फ आधा ही पार हुआ था।

थोड़ी देर बाद रास्ता इतना इतना संकरा हो गया कि सिर्फ एक आदमी एक बार में पार कर सकता था। एक हाथ पर गहरी खाई थी तो दूसरी तरफ धूप और थकान से चक्कर भी आ रहे थे। एक गलत कदम और सीधे खाई में और रियेक्ट करने के लिए दूसरे व्यक्ति के पास टाइम और ताकत भी नहीं थी। ॐ नमः शिवाय और शिव का ध्यान दिमाग में था क्योंकि सुरक्षा अब केवल वही दे सकते थे और दे रहे थे। 9  बजे से लगातार चलते हुए शाम के तीन बज चुके थे।

सांस कम होती जा रही थीं और रास्ता अभी 6 किलोमीटर और था। एक बार लगा गलती कर गए – मद्महेश्वर इतना आसान नहीं है क्योंकि ट्रैकर जो आते हैं वो एक दिन में सिर्फ 9 किलोमीटर ही सफर तय करते हैं। परेशानी ये थी कि इनके पास सर छुपाने की कोई व्यवस्था भी नहीं थी – मौसम बेरहम था – रात को ठण्ड हडडी फोड़ने लगती है वहां और बारिश में अगर भीग गए तो मौत कब धीरे से आ जाएगी पता भी नहीं देगी।

 

मौत कर डर – बेरहम मौसम और महादेव से मिलने की इच्छा में द्वंद चल रहा था लेकिन कभी कभी ज़िन्दगी शायद कोई और विकल्प छोड़ती भी तो नहीं है। चलना ही ज़िन्दगी है। थोड़ी थोड़ी देर रूक कर पहाड़ के संकरे दर्रों और रास्तों होते हुए दूर एक रौशनी दिखी। नितिन की आँखों से आंसू निकल गए। और हौंसला बढ़ गया। एक लम्बी, बेहद थका देने वाली यात्रा के बाद एक शानदार ताल दिखा और दूर तक फैला एक बुग्याल। पहाड़ में घास के मैदान को बुग्याल बोलते हैं। उस बुग्याल में एक ताल और सैंकड़ो बकरियां चारा चर रही थीं। और दूर एकांत में शांति और समाधि में थे भगवान मद्महेश्वर

वैसे दिल्ली से मद्महेश्वर 500 किलोमीटर दूर है जिसमें 18 किलोमीटर का पैदल रास्ता भी शामिल है। नितिन, मयंक और उनके दोस्त के अलावा एक पुजारी और कुछ खाने की दुकानों के अलावा कोई और वहां नहीं था। शाम हो चली थी। ठण्ड पड़नी शुरू हो गयी थी। एक स्थानीय व्यक्ति ने रुकने के लिए जगह दे दी। सबके मन में एक ही ख्याल था कि दिल करे रुक जा रे रुक जा – यहीं पर कहीं – जो बात इस जगह में है वो कहीं पर नहीं। वैसे अगर आप मद्महेश्वर जाना चाहें तो कम से कम 4 दिन दुनिया से अगर कट सकें तो यात्रा कीजियेगा और एक अच्छा गाइड भी जरुरी है।

 

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