आखिर कैसे बनते हैं ब्रह्म ऋषि ?

नई दिल्ली ।  सनातन धर्म गुरु परंपरा से चलता है।  एक बार महाकुम्भ जाने का अवसर मिला तो मुलाकात हुयी योगियों और साधुओं से। सभी के मुँह से एक ही शब्द निकलते देखा – गुरु महाराज। एक आम व्यक्ति देवताओं और अपने इष्ट को मानता है लेकिन साधक गुरु महाराज से बंधे होते हैं। बहुत दिन बाद ये समझ बात आयी की गुरु ही ईश्वर है। क्योंकि वही राह दिखता है – हर व्यक्ति का गुरु अलग है। हर एक खिलाड़ी का  एक कोच है – तो कोई अपने माता पिता को गुरु मानता है। जीवन में गुरु एक मार्गदर्शक की तरह है। वो आपकी सृष्टि ही बदल देती हैं।

एक सिद्ध योगी नारायण बाबा कहते हैं की गुरु – भक्त – भक्ति – और भगवान् – इन तीनों में की भेद नहीं । ये एक हैं – दिखते अलग हैं लेकिन भेद नहीं है। भेद केवल समझ का है। वहीँ संत कबीर कहते हैं की “गुरुगोविन्द दोनों खड़े – काके लागूं पांव – बलहारी ऐसे गुरु पर – गोविन्द दीओ मिलाये “. जब एक मैकेनिकल इंजीनियर बाबा ब्रह्मचारी नर्मदाशंकर – नर्मदा के किनारे अपने गुरुभाई किशनदास की गुफा में आश्रय लिए हुए थे तो एक दिन उन्होंने सुबह 4 बजे एक योगी को उप्पर पहाड़ से नीचे माँ नर्मदा में स्नान करते आता देखा। पहली जी  नज़र में उस मैकेनिकल इंजीनियर को उसमे एक एनर्जी दिखाई दी।  एक तेज जो  उन्होंने यूरोप में किसी के चेहरे पर नहीं देखा था। वो योगी थे – ब्रह्मचारी बाबा राघवनाथ जी महाराज। उनकी सिद्धि और उनके तप का जिक्र पूरे ओंकारेश्वर में प्रकाश की तरह फैला हुआ था। कम बोलते थे लेकिन उन्होंने बाबा नर्मदाशंकर को शिष्य स्वीकार किया। बाबा रघुनाथ जी महाराज माँ गायत्री की तपस्या करते थे।

उनका योगी जीवन शुरू हुआ सन 1940 में जब उन्होंने महज 20 वर्ष की आयु में सन्यास ली लिया। अस्टांग योग के कुछ गुप्त ध्यान की विधियों पर उन्होंने सिद्धियां हांसिल करना शुरू किया। फिर 1945 में वाराणसी से संस्कृत सीखी और पुराणों और वेदों का अध्यन किया।  1947 में उन्होंने एक ऐसा संकल्प लिया की जो कि बेहद कठिन तपस्या थी। बाबा रघुनाथ जी महाराज ने गायत्री पुरुश्चरण पूर्ण करने का संकल्प ले लिया। एक गायत्री पुरुश्चरण करने के लिए गायत्री मन्त्र को उसके बीज मन्त्र के साथ जपना होता है। यदि पंडितों से कोई इस संकल्प कर कराना चाहे तो करीब 2000  पंडित एक गायत्री पुरुश्चरण को पूरा करने के  लिए 3 हफ्ते का समय लेंगे। क्योंकि सवा करोड़ गायत्री मंत्र करना किसी अकेले व्यक्ति के बस की बात नहीं – लेकिन बाबा रघुनाथ जी महाराज ने अकेले ही 3 साल में एक गायत्री पुरुश्चरण पूर्ण कर लिया।

 

इस योगी की प्यास यहीं ख़त्म नहीं हुयी – 1952 में ओम्कारेश्वर की सबसे ऊँची छोटी पर जाकर उन्होंने फिर गायत्री पुरुश्चरण शुरू कर दिए। इसी छोटी पर राजा मान्धाता ने महादेव की तपस्या की थी। यहाँ गुरुदेव रघुनाथ जी ने 8 गायत्री पुरुश्चरण पुरे किये। सनातन  परंपरा के तहत 7 गायत्री पुरुश्चरण पूरे करने पर ब्रह्म ऋषिपद मिलता है। और गुरुदेव रघुनाथ जी महाराज ये पार कर चुके थे लेकिन उन्होंने कभी इस पद को अपने नाम के आगे नहीं लगाया। क्योंकि ये यहाँ रुकने यहाँ रुकने वाले नहीं थे। इस परंपरा के नियम बेहद कठिन है।

 

1 . पूर्णब्रह्मचर्य

2-अपना खाना खुद पकाना

3 .  दिन में तीन बार स्नान

4-केवल माँ गायत्री का ध्यान

बाबा नर्मदाशंकर बताते हैं की उनके गुरुदेव बाबा रघुनाथ जी ने ओम्कारेश्वर के श्री सिद्धनाथ महादेव मंदिर में फिर तपस्या शुरू की। लेकिन इस बार उन्होंने अपने तप को कठिनतम कर डाला। उन्होंने गायत्री पुरुश्चरण के साथ अष्ट रूद्र अधयाय और दुर्गा सप्तसती का पाठ भी शुरू कर दिया। लोग इन्हे रुद्री और चंडीपाठ के नाम से जानते हैं। अपने  योगी जीवनकाल में उन्होंने  कुल 21 गायत्री पुरुश्चरण पुरे किये और सवा लाख लखचंडी। यानी भारतवर्ष में बहुत कम साधक या योगी बाबा रघुनाथ जी महाराज को छू पाएंगे।

 

बाबा ब्रह्मचारी नर्मदाशंकर से मैंने पुछा क्या गायत्री मन्त्र आम व्यक्ति को जपना चाहिए ? बोले – किसी को मना तो नहीं है लेकिन अगर पवित्रता में कमी है तो ठीक नहीं है क्योंकि ब्रह्मचर्य माँ गायत्री को पाने का सबसे पहला नियम है। यदि इस नियम का पालन नहीं कर सकते हो फिर परिणाम कुछ भी हो सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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