कोशी शनि मंदिर के निराले संत

नई दिल्ली । शुक्रवार की दोपहरी थी। हम पहुंचे कोकिला वन – वृन्दावन के करीब शनि भगवान के मंदिर। एक छोटी सी फिल्म बनानी थी शनि महाराज पर। जब पहुंचे तो मंदिर परिसर में मुलाकात हुयी रिंकू चौधरी से। हम दरअसल ढूंढ़ तो रहे थे महंत जी को लेकिन मिल गए रिंकू। लेकिन अच्छा ही हुआ,वो वहां मीडिया प्रभारी हैं और आश्रम की देखरेख भी करते हैं। लेकिन सवाल ये था कि महंत प्रेमदास जी महाराज कहाँ थे। मंदिर में बहुत ढूँढ़ा लेकिन नहीं मिले। खैर हम रिंकू के पीछे पीछे रहे और मंदिर से बाहर थोड़ी दूर पर एक तुलसी के पेड़ ने नीचे माला जपते मिले श्री प्रेमदास जी महाराज।

देखकर हैरानी ये हुयी कि कोशी का शनि मंदिर उत्तर भारत में सबसे ख्याति प्राप्त मंदिर है और उसके महंत चुपचाप दुनिया की नज़रों से दूर एक पेड़ की ओट में हरे कृष्ण की माला फेर रहे थे। यहाँ बता दूँ कि शानिवार  को एक लाख आदमी कोशी के शनि मंदिर आता है। इतना बड़ा मंदिर –  मान्यता और महंत जी बिलकुल फकड़।

रिंकू ने जोर से चिल्ला कर कहा कि दिल्ली से लोग आये हैं आपसे मिलने। खड़े हो गए और बड़े प्रेम से बोले तो पानी और दूध पिलाते पहले,कान्हा के घर आये हैं। फिर हमारे साथ ही हो लिए। कभी कभी इतनी सरलता भी प्रश्न से खड़े कर देती है क्योंकि हम अक्सर झूठ और माया नगरी के दिखावे का शिकार हैं। महंत जी मंदिर के अंदर आ गए। बैठ गए अपने तख़्त पर – माला जपते रहे – कुछ बुदबुदाते रहे और रिंकू पानी और दूध लाने चला गया। एक बार भी उन्होंने ये उत्साह नहीं दिखाया कि हम उनका इंटरव्यू लेने आये हैं।

वृन्दावन में कान्हा से जुड़े सभी संत करीब करीब इतने ही सरल रहे हैं।  176 साल के हनुमानदासजी से जब मिला था तो बिलकुल उनका भी यही हाल था कि वो सिर्फ राम राम राम जपते रहे। नारायण बाबा ने एक बार बताया था कि वृन्दावन के संत भाव वृन्दावन में रहते हैं। एक वृन्दावन आँखों से दिखाई देता है तो भाव वृन्दावन में संत केवल कृष्ण को ही देखते हैं।

महंत प्रेमदास जी महाराज की कहानी भी बेहद निराली है। अब से लगभग 83 वर्ष पहले एक महिला के घर बच्चे नहीं होते थे। उसने कोकिल वन आकर शनि भगवान् और बिहारी जी से बच्चा माँगा और कहा कि पहला बच्चा वो मंदिर को दान कर देगी। वक़्त आया और बच्चा भी हो गया। वायदे के अनुसार महंत जी बच्चा लेने गांव पहुँच गए लेकिन माँ की ममता आगे आ गयी। उसने भरी पंचायत में बच्चा देने से इंकार कर दिया। सवाल था शनिदेव से वादा निभाने का। सो गांव की एक और महिला ने कहा कि महंत जी खाली हाथ नहीं जायेंगे। सो अपना बच्चा उनकी गोद में रख दिया इस वादे के साथ कि वो अपने बेटे मुँह दोबारा नहीं देखेगी ताकि ममता आड़े न आ सके।

 

प्रेमदास जी शनि मंदिर में पलने लगे और समय आने पर महंत भी बने। लेकिन माया ने कभी उनको छुआ तक नहीं। मंदिर में लाखों रुपए का चंदा आता है लेकिन उन्होंने अपना कोई बैंक अकाउंट नहीं खोला। एक अनुमान से हर रोज 2  से 3 हज़ार लोग दर्शन को आते हैं और शनिवार को करीब लाख तक ये संख्या पहुंच जाती है।

खुद के लिए सिर्फ धोती , एक कमरा और माला ही उनके लिए काफी थी लेकिन समाज के लिए इस गुरु ने सेवा के द्वार खोल दिए। मंदिर में सभी के लिए तीन वक़्त का खाना मुफ्त मिलता हैं। अमीर गरीब सभी कोकिल वन रसोई से खाना खा सकते हैं। रसोई के नियम बेहद कड़े हैं। सफाई और स्वाद दोनों का ख्याल रखा जाता है। हमने भी कान्हा की इस रसोई से चाय – पकोड़े  – कढ़ी और चावल खूब पेट भर खाये। मंदिर के पास करीब 2000 ऐसी गायें हैं जिन्हे छोड़ दिया गया था लेकिन प्रेमदास जी ने सभी को अपनाया। बहुत से बच्चों की पढाई की पूरी ज़म्मेदारी महंत जी ने अपने ऊपर ली हुयी है।

कोकिल बन का इतिहास बेहद पुराना है। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शानि भगवान उनके दर्शन के लिए नंदगांव गए लेकिन माता यशोदा ने मन कर दिया। माता ने कहा कि शनि की वक्रदृष्टि उनके बेटे पर नहीं पड़नी चाहिए। शनिदेव भगवान का दर्शन नहीं कर पाए। निराश होकर कोशी गांव में तपस्या करने लगे कि जब कान्हा प्रसन्न होंगे तो दर्शन देंगे। कहते है कि बिहारी जी ने उन्हें एक कोयल के रूप में दर्शन दिए और शनिदेव को आशीर्वाद भी  दिया। कहते हैं कोकिल बन का ये स्थान तभी का है और यहाँ शनिदेव को छोटे ठाकुर के नाम से भी पुकारते हैं।

नारायण बाबा कहते हैं कि जिसका जैसा भाव उसका वैसा भगवान्। करोड़ों लोग आज शनि मंदिर आते हैं और उनमे आस्था भी रखते हैं। इसीलिए कोकिल वन में वो परिक्रमा करके शनिदेव को अपने कर्म भी सौपते हैं ताकि उन पर वक्र दृष्टि न पड़े।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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