1000 साल पुराने तालाब की आखिरी साँसें

नई दिल्ली ।  बात सन 1330 की है।  अफ्रीका के मोरक्को देश के जाने माने ट्रैवलर इब्नबतूता ने जब मेहरौली के हौज़ ए शम्सी को देखा तो वो बोले कि उन्होंने अपनी  यात्राओं के दौरान इतना बड़ा तालाब नहीं देखा है।  ये बात मशहूर गाँधीवादी अनुपम मिश्र ने अपनी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब ‘ में लिखी है।  कहते हैं कि दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने जब इसे बनवाया तो ये करीब 5 एकड में फैला था। इल्तुतमिश ने लिखवाया कि इस तालाब को बनवाने के लिए उन्हें एक सपना आया था जिसके बाद एक सूफी संत क़ुतुब बख्तियार काकी ने भी तालाब बनाने की बात कही।  ये बात करीब करीब 1215 की रही होगी जब सुल्तान ने महरौली में ख़ास इसी जगह आकर तालाब के निर्माण का आदेश दिया।

इस तालाब को हमेशा रूहानी नज़र से देखा गया।  हो भी सकता है क्योंकि हज़ार साल से ये तालाब खुद को बचाये खड़ा है।  मुझे याद है कि जब पाइपलाइन का पानी नहीं आता था तब महरौली में कुंए और इसी तालाब से जीवन चलता था।  महरौली अरावली पहाड़ी पर बसा हुआ एक ऐसा गांव है जो दिल्ली सल्तनत के राज की गवाह बनी।  क़ुतुबुद्दीन एबक, रज़िया सुल्तान, बलबन, इल्तुतमिश इन सभी ने यहीं से दिल्ली की कमान संभाली। ऐसे में जाहिर है कि शम्सी तालाब की जरुरत  कितनी ज्यादा रही होगी क्योंकि इस इलाके में बारिश  कम पड़ती है और ये यमुना से भी बहुत दूर है।

अक्सर दादी का हाथ पकड़कर जंगल के रास्ते से होते हुए पहुंचते थे।  दादी तालाब पर कपड़े धोती थी  और वहीँ मेहरौली के बाकी लोग भी मिल जाया करते थे।  इस तालाब से न सिर्फ जीवन चलता था बल्कि ये पूरे महरौली के लिए मिलने की और बातचीत की एक जगह भी होती थी।  तालाब के पूरब में जहाज महल आज भी है।  जहाज महल का मतलब है पानी के पास या फिर पानी के अंदर स्थित महल। यानी उस वक़्त जहाज  महल तक जाने के लिए कश्ती का इस्तेमाल होता था।  लेकिन हज़ार साल में ये सुकुडता चला गया।  आदमी की हवस इसे निगलती चली गयी।

सोचने की बात ये है कि पाइप वाटर दिल्ली में बहुत देर से आया।  महरौली में तो ये 80 के दशक में आया।  आज हालत ये है कि सरकारी नलों से पानी 10 दिन में आता है और 1000 में शम्सी तालाब ने लाखों लोगों की प्यास बुझाई है।  मानुष पानी रखिये – ये बात कितनी सटीक है।  और ये बात भी सच है कि ये तालाब रूहानी है क्योंकि जो लाखों लोगों की प्यास बुझाये वो सच में रूहानी ही हो सकता है।  लेकिन इंसान इतना स्वार्थी है कि इसे मरने के लिए छोड़ दिया गया है।

पहले सिर्फ बारिश के पानी से ये भरा करता था लेकिन अब सीवर का पानी इसमें छोड़ दिया है।  इसके चारों तरफ इंच इंच ज़मीन घेर ली गयी है। सरकार ने अब चारों तरफ बाड़ लगा दी है जिससे  आज के नौजवानों का इससे कोई रिश्ता नहीं रह गया है।  अब ये सिर्फ एक नाम बनकर रह गया है जिसे हर साल सिर्फ फूल वालों की सैर के वक़्त साफ़ किया जाता है।

 

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