मुक्ति की आखिरी सीढ़ी मुक्तिनाथ

नई दिल्ली । लगभग 16 घंटे की लम्बी यात्रा कर लाजपत नारायणपुर पहुंचे। नारायणपुर नेपाल में चितवन नेशनल पार्क के पास एक गांव है। खूबसूरत लेकिन सफर तोड़ देने वाला होता है। लेकिन रास्ता अभी और लम्बा होने वाला था क्योंकि मंज़िल अभी बहुत दूर थी। दिल्ली से बम लाहिरी टीम के सदस्य लाजपत सिर्फ और सिर्फ मुक्तिनाथ यात्रा के लिए नेपाल पहुंचे थे क्योंकि पशुपतिनाथ की यात्रा वो कर चुके थे।

दरअसल उन्होंने मुक्तिनाथ का नाम बाबा ब्रह्मचारी नर्मदाशंकर और एक ने पाली महिला दुर्गा अधिकारी के मुख से सुना था। बाबा नर्मदाशंकर ने शिव के सभी तीरथ पूरे पर लिए हैं अब सिर्फ मुक्तिनाथ की यात्रा शेष है। बाबा नर्मदाशंकर के मुताबिक किसी भी योगी के लिए आखिरी धाम मुक्तिनाथ है क्योंकि वो ही आत्मा को जीवन मृत्यु से मुक्ति प्रदान करते हैं। योगियों के मुताबिक गुरु गोरखनाथ ने मुक्तिनाथ में तप भी किया था।

दरअसल मुक्तिनाथ के रास्ते साल में कुछ ही समय की लिए खुलते हैं। जून – जुलाई और दशहरे के दौरान बाकी वक़्त मुक्तिनाथ दुनिया से कटा रहता है। या तो बर्फ से या बारिश इतनी होती है कि गाड़ियों के चलना नमुमकिन हो जाता है। लेकिन बम लाहिरी टीम को तो वहां पहुंचना ही था। सो लाजपत ने अपने नेपाली दोस्तों के साथ नारायणपुर से पोखरा जाने का फैसला ले लिया। उस वक़्त भी बारिश बहुत ज्यादा थी। और पोखरा तक पहुँचने में ज़िंदगी मौत के बीच झूलना पड़ा। बहुत बार गाडी दलदल में फँसी और बहुत बार खाई की तरफ फिसल गयी। 10 घंटे बिना रुके चलने बाद पोखरा पहुंचे। आगे जाने के रास्ते बंद थे। तो दो दिन रुकना पड़ा पोखरा में ही, क्योंकि तेज बारिश और गाड़ी वाले ने आगे जाने से इंकार कर दिया।

दो दिन बाद धूप निकली तो आगे बढ़ने का फैसला किया। पोखरा से अब झोमसोम पहुंचना था जिसमें कुछ 14 घंटे लगने थे। और अगर बीच में लैंड्स स्लाइड हो गयी तो समझो कुछ भी हो सकता है। नेपाली लोगों के लिए मुक्तिनाथ पशुपति से बड़ा तीर्थ है। हर नेपाली खासकर महिलाएं इस यात्रा को अपने जीवन में एक बार पूर्ण करना चाहती हैं। वो अपने परिवार की खुशहाली और अपनी जीव मुक्ति की प्रार्थना करतीं हैं। यहाँ कुछ महिलाएं पैदल पहाड़ियां पारकर के एक महीने में पहुंचती है। बीच में हाथी और तेंदुओं से लोहा लेती हैं लेकिन उनकी इच्छा शक्ति को कोई डिगा नहीं सकता। यहाँ आकर वो गौरीकुंड में स्नान करती हैं और फिर यहीं से जल लेकर वो काठमांडू में पशुपतिनाथ के जल अभिषेक भी करतीं हैं।

बम लाहिरी टीम धीरे धीरे झोमसोम की तरफ बढ़ रही थी। ऊंचाई बढ़ी जा रही थी। कार 4 हज़ार मीटर की ऊंचाई पर चल रही थी लेकिन गड्डे और संकरे रास्तों की वजह से चलना मुश्किल हो रहा था। हिमालय की ऊँची बर्फ से ढकी पहाड़ियां अब दिखने लगी थीं। हवाएं बर्फीली हो गयीं थीं। ऐसा लगता था मानो मुक्तिनाथ रास्ते को और मुश्किल ही बना रहे थे। कदम कदम पर खतरा मंडरा रहा था।

बहुत जगह ऐसी आयी जहाँ गाड़ियां आपस में अड़ गयीं और बड़ी मुश्किल से दोनों पार हुईं। काली नदी बराबर में बह रही थी और एक बार रास्ता पार करने के लिए तो नदी पार करनी पड़ी। कार नदी में फंस गयी और बम लाहिरी टीम को नदी में कार को धक्के लगाने पड़े। लेकिन नदी का पानी इतना ठंडा था कि पूरा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया। खैर कपड़े बदलकर बमलाहिरी टीम फिर मुक्तिनाथ की और बढ़ गयी।

ऑक्सीजन कम होती जा रही थी और सफर पूरा होने का नाम नहीं ले रहा था।  12 घंटे बीत चुके थे और अब 2 घंटे और चलना था। ॐ नमःशिवाय करते करते लाजपत और बमलाहिरी टीम पहुँच गए मुक्तिनाथ। उतरते ही जैसे ही बर्फ की ऊँची ऊँची पहाड़ियों को देखा और घाटी में मुक्तिनाथ जी को देखा तो जैसे सफर की थकान कहाँ चली गयी पता ही नहीं चला।

 

अब कोई मन में सवाल नहीं था – जीवन में आपाधापी नहीं थी – कोई फ़ोन नहीं थे – कोई लगाव किसी से नहीं था – बस मुक्तिनाथ थे और बम लाहिरी टीम थी। एकांत था – शिव की समाधि थी और पार्वती माँ का कुंड था। ये दुनिया से परे की एक दुनिया है जहाँ सच में आत्मा शरीर छोड़कर बस हिमालय में रम जाना चाहती थी। अब कोई इच्छा नहीं रही थी किसे  के मन में – बस शिवत्व का बोध था।

 

जो लोग मुक्तिनाथ गए उन्होंने एक ही बात कही कि शिव हैं – शिव सुंदर हैं और शिव सत्य हैं – शिव ही शाश्वत हैं। सत्यम,शिवं, सुंदरम।

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *