दिल्ली में फूल वालों की सैर 

नई दिल्ली । मशहूर शायर ग़ालिब दिल्ली की शान रहे।  1857 के बाद जब मुग़ल सुल्तनत का अंत हुआ तो उन्होंने लिखा कि दिल्ली जब तक दिल्ली है जब तक यहाँ चांदनी चौक है और फूल वालों की सैर है।  जब ये ख़त्म हो जायेंगे तो दिल्ली बेजान हो जाएगी।  और ऐसा है भी आज भी दिल्ली चौक न सिर्फ पूरे मुल्क में अपनी अलग संस्कृति और तौर तरीकों के लिए मशहूर है।  फूल वालों की सैर भी यूँ कहें कि साथ रहने और मिलजुल कर त्यौहार और जीवन जीने का एक अनूठा तरीका है।

आज भी फूलवालों की सैर का महरौली में इंतज़ार लोगों को रहता है। मेला लगता है और दूर दूर  लोग इसमें शामिल होने आते हैं।  टेलीविज़न के  दौर में भी इस तीन दिन के महोत्सव के प्रति लोगों में दिलचस्पी बनी हुयी है।  महरौली दिल्ली का ब्रह्मस्थान है जहाँ योगमाया जी का 5000 साल पुराना मंदिर है और 1000 साल पुरानी सूफी संत क़ुतुबद्दीन भक्तियार काकी की दरगाह।  दिल्ली में इन दोनों पूजा की जगहों को लोग बेहद मानते हैं।

बात लगभग 1830 के आसपास की है।  दिल्ली में अकबर  द्वितीय का शासन था।  वो मिर्ज़ा जहांगीर को अपना वारिस बनाना चाहते थे।  लेकिन ब्रिटिश रेजिडेंट के साथ उसने बुरा बर्ताव कर दिया और उस पर गोली भी चला दी।  लेकिन गोली एक सिपाही को लगी।  मिर्ज़ा जहांगीर को इलाहाबाद भेज दिया गया।

इस घटना ने मुग़ल बादशाह और उनकी पत्नी मुमताज महल बेगम को बहुत दुख हुआ।  कहते हैं कि मुमताज महल को सपने में योगमाया ने दर्शन दिए और कहा कि उनका बेटा लौट आएगा।  साथ ही रानी ने भक्तियार काकी से भी अर्ज लगायी कि अगर जहांगीर लौट आया तो वो फूलों के पंखे चढ़ायेंगी और नंगे पाँव दर्शन को आएँगी।  कुछ ही दिन बाद मिर्ज़ा जहांगीर इलाहाबाद से लौट आया।

अपने वचन निभाने के लिए बेगम मुमताज ने लाल क़िले से महरौली तक नंगे पाँव यात्रा की।  हालाँकि उनके लिए रास्ते भर फूल बिछाये गए ताकि पांव सलामत रहें।  बेगम ने सूफी संत और योगमाया दोनों के दर्शन किये।

बादशाह ने तीन दिन महरौली में बिताये और महरौली को फूलों से सजाया गया।   अकबर शाह जब तक ज़िंदा रहे तब तक वो योगमाया और काकी के दर्शन एक साथ ही किया करते थे।

हालाँकि 1857 के बाद फूल वालों की सैर कुछ समय रुकी लेकिन ब्रिटिश ने इसे फिर से शुरू दिया।  उसके बाद भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी ब्रिटिश ने इस पर रोक लगायी लेकिन आज़ाद भारत में पहले प्रधान मंत्री नेहरू ने इसे दोबारा शुरू करवाया।

वो खुद महरौली आया करते थे।  अब बादशाह तो रहे नहीं लेकिन दिल्ली के उपराज्यपाल इसकी शुरुआत करते हैं।  इस अवसर पर झूले लगाए जाते हैं – कव्वालियाँ होती हैं – फूलों से जहाज महल को सजाया जाता है और बहुत से कार्यक्रम होते हैं।

भारत के गंगा जमुना तहजीब की  ये एक ज़िंदा मिसाल है जो फूलों की खुशबू और उनके रंग में सब कुछ एक कर देती है।  आज भी योगमाया पर फूलों के पंखे और काकी की दरगाह पर चादर और फूल चढ़ाय जाते हैं।

 

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