जंगलों में छिपे हैं असल योगी

नई दिल्ली । रात को बैंगलोर एयरपोर्ट पर उतरा तो रमेश मुनियप्पा भैया मुझे लेने बाहर खड़े थे। टोनी, मैं और रमेश भैया रात को बैंगलोर में ही रुके और सुबह हम मैसूर के लिए निकल पड़े। रास्ते में रमेश भैया ने कहा इस बार बी आर हिल्स जरूर जाना है। सोचा ऊटी शायद लेकर जाएँ लेकिन उन्होंने कहा कि ऊटी अलग है और बी आर हिल्स अलग । इससे पहले कि मैं कुछ पूछता भैया ने खुद ही बता दिया कि बी आर हिल्स का मतलब है बिल्लिगिरि रंगा हिल्स यानी सफ़ेद बादलों पर विराजमान विष्णु। वाह क्या नाम है सुनकर ही लगा कि कुछ करें या न लेकिन यहाँ जरूर जाना है।

बीआरहिल्स – एक ट्रॉपिकल फारेस्ट है कर्नाटक में जो कि वेस्टर्न और ईस्टर्न घाट्स के बीच में पड़ता है। बायोलॉजिस्ट की माने तो ये भारत की सबसे बेहतरीन बायो डायवर्सिटी का एक प्रतीक है जहाँ जंगली जानवरों की प्रजातियों से लेकर फूल, पेड़ और पौधों की सबसे ज्यादा किस्मे पायीं जाती हैं। लेकिन, रमेश मुनियप्पा भैया ने एक रहस्य छुपाया हुआ था जो तभी खुल सकता था जब हम उस जंगल में पहुंचते।

मैसूर में अब रुकना मुश्किल था सो गाडी उठायी और चल दिए एक ऐसे जंगल की ओर जो बेहद घना हुआ था और टूरिस्ट बेहद कम ही वहां जाते थे। रमेश भैया ने रहस्य से पर्दा उठाते हुए एक साध्वी से हमें मिलाया जो स्वामी श्रीरामकृष्ण परमहंस से जुडी थीं और एक घने जंगल में मानव सेवा का काम करती थीं।

भैया ने कहा कि पूरे जंगल में इन्हे   माताजी के नाम से जानते हैं और इन्होंने जवानी में ही संन्यास ले लिया था और आदिवासियों की सेवा में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। माताजी को देखकर सच्ची सेवा भावना से मुलाकात हुयी। लेकिन अभी तो शुरुआत ही थी। माताजी रमेश भइया की बड़ी बहन थीं जिन्होंने सेवा का मार्ग अपनाया था।

देर रात हम बी आर हिल्स पहुंचे। ऐसी काली और घुप्प रात बहुत पहले कभी मेहरौली में देखा करते थे। इतनी डरावनी रात और इतना सन्नाटा की एक बार ख़ामोशी भी शायद डर जाए। रात में सिर्फ एक कार की हैडलाइट से हम कुछ देख पा रहे थे लेकिन माता जी को जैसे जंगल का चप्पा चप्पा पता था। गाडी एक बड़े सी ईमारत के सामने रुकी। सामने बड़ा मैदान था लेकिन अँधेरा बहुत गहरा था। माताजी तो गाड़ी से उतरीं और सीधे न जाने अँधेरे में कहीं खो गयीं। रमेश भैया का बेटा भी उनके पीछे पीछे अँधेरे में कहीं खो गया। माता जी ने कन्नड़ में जोर से आवाज दी और आने को कहा। हम रमेश भैया पीछे चल दिए।

पगडंडियों के सहारे हम एक कुटिया के सामने पहुँच गए। क्या खूबसूरत कुटिया थी। और जब वहां बैठे तो पाया कि हज़ारों जुगनू हमारे इर्द गिर्द घूम रहे हैं। सच में ये एक अनछुआ जंगल था जहाँ शहर के लोगों का प्रकोप अभी नहीं पहुंचा था। थोड़ी थोड़ी ठण्ड थी – हल्की हल्की फुहारें थीं – और माताजी के हाथ की चाय थी। एक बार लगा कि काश वक़्त थम जाए।

रात बीती सुबह हुईं। चिड़ियों की चहचहाट के अलावा दूसरा कोई और शोर नहीं था। रात जहाँ काटी थी सुबह वहां एक स्कूल दिखाई पड़ा। हालाँकि जब हम वहां थे तब बच्चो की छुटियाँ थीं। लेकिन जंगल में स्कूल, दूसरी तरफ नज़र गयी तो आईटीआई का कॉलेज। ये जंगल में मंगल कैसे। माताजी ने नाश्ते में डोसा बनवाया था। लेकिन नाश्ते से पहले सबको एक छोटी सी कुटिया में स्वामी रामकृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानंद की आरती के लिए उन्होंने बुलाया। छोटा मंदिर था लेकिन बेहद प्रभावशाली। एक अलग एहसास था। नाश्ते की टेबल पर माताजी से सवाल किये कि आखिर ये स्कूल का क्या राज है।

माताजी ने बताया कि ये जंगल आदिवासियों से भरा है उनका नाम है सोलीगा। सोलीगा का अर्थ है चिल्ड्रन ऑफ़ बैम्बू। दरअसल बात 1976 की है जब एक युवा डॉक्टर ने एक सोच बनायीं कि वो आदिवासियों को आम धारा में जोड़ेंगे। इसके लिए उन्होंने अस्पताल जाने की बजाए रामकृष्ण मिशन को ज्वाइन किया। हिमालय में रहे और बेल्लूर मठ में भी।

कर्नाटक लौटकर वो बी आर हिल्स गए और सोलिगा ट्राइब से मुलाकात करने की कोशिश उन्होंने की। लेकिन बदले में उनका स्वागत तीरों से हुआ – हज़ारों हाथियों से हुआ। लेकिन डॉक्टर सुदर्शन ने हार नहीं मानी और टिके रहे। धीरे धीरे आदिवासियों का इलाज करना शुरु किया। और वहां से एक विश्वास की शुरूआत हुई।

 

डॉक्टर सुदर्शन को फिर माताजी  हुचेगौड़ा का साथ मिला और शुरुआत हुयी विवेकानद गिरि जन कल्याण केंद्र की जिसके बाद सोलीगा स्कूल ने आकार लिया। आदिवासी बच्चे हाथियों,  बाघों और सापों के बीच से होते हुए स्कूल आने लगे।

समय बीतता गया और आज 800 बच्चे इस स्कूल में पड़ते हैं। बहुत से बच्चे अब बाकी दुनिया में हायर एजुकेशन के लिए जा चुकें हैं। 72 प्राइमरी हेल्थ एजुकेशन सेण्टर भी इन योगियों ने खोले हैं।

ये वो कर्मयोगी हैं जिन्होंने स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर चलते हुए युवा पीड़ी का मार्गदर्शन निष्काम भाव से किया है। डॉक्टर सुदर्शन और माताजी वो सन्यासी हैं जिन्होंने एक घने जंगल में रहकर कर्म और ध्यान दोनों की तपस्या की है और आज फल सामने है।

इन दोनों ने आज स्कूल के साथ साथ रोजगार के लिए भी बहुत काम किये हैं। कॉफ़ी प्रोसेसिंग यूनिट – हनी कलेक्शन सेण्टर भी आदिवासियों खोलाहै। शर्त है की प्रकृति को नुक्सान न पहुँचाया जाये और बिना मिलावट चीजें लोगों तक पहुंचाई जाएँ। माता जी कहतीं हैं संन्यास बहुत कुछ सीखता है लेकिन आनंद इस बात का है कि सीखा सब तक पहुंचे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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