स्कूली बच्चे गूगल के भरोसे

नई दिल्ली । 11 साल का केशव स्कूल से लौटते ही कंप्यूटर पर बैठ जाता है। माँ डांटती है लेकिन केशव कंप्यूटर से नहीं हटता। वजह है कि उसका सारा काम ऑनलाइन है और उसे अपनी वर्कशीट वहीं से निकलवानी पड़ती है। केशव का बहुत वक़्त ऑनलाइन शीट्स से सवालों का हल ढूढ़ने में निकलता है। केशव जैसे लाखों बच्चें अब दिल्ली में कुछ ऐसा ही कर रहे हैं।

पता नहीं आपको ये इल्म या है नहीं कि आज अगर घर में एक कंप्यूटर या इंटरनेट न हो तो आपका बच्चा एक पब्लिक स्कूल में नहीं पढ़ सकता। बच्चों को नेट से अलग रखने के लिए टीचर्स हर पैरेंट टीचर मीटिंग में बड़े बड़े लेक्चर देते हैं लेकिन उन्हीं का स्कूल सारा होम वर्क अब ऑनलाइन देता है। माँ बाप को भी बहुत सी जानकारियां स्कूल पोर्टल से मिलती हैं ऐसे में एक गरीब बच्चा कहाँ जाये। गरीब ही क्यों क्या एक मिडिल क्लास का परिवार इतना बोझ उठा सकता है। एक कंप्यूटर, प्रिंटर, प्रिंटर के पेपर्स, हर महीने नेट का खर्चा, प्रिंटर के रंग और उस का रखरखाव पर हज़ारों रुपए खर्च हो रहे है। एक पब्लिक स्कूल में एक बच्चे की फीस तीन महीने से कम नहीं जाती। ज्यादार परिवारों पर लगभग 15000 रुपए प्रति बच्चे का खर्च आता है। स्टेशनरी का तो हर महीने हर परिवार पर कम से कम नहीं तो 3 से 5 हज़ार का खर्च आता ही है। माता पिता पर घर के खर्चों के अलावा हज़ारों रुपए का ये खर्च भी है तो किसी गिनती में नहीं आता।

हाल ही में दिल्ली के राज्यपाल ने 449 स्कूलों की मनमानी थोड़ी रोक लगायी है। फीस बढ़ाने के मामले में उन्होंने सरकार से स्कूलों को टेकओवर करने की बात कही है। उम्मीद है फीस का बोझ अभिभावकों पर पहले से कुछ कम पड़ेगा। साथ ही सरकार इस ऑनलाइन होमवर्क के अज़गर पर भी नकेल कैसे तो राहत होगी।

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