क्या हुआ गुफा में बंद होने के बाद

 

नई दिल्ली। सिद्ध योगियों की गुफाएं हुआ करती हैं। स्वामी राम ने अपनी किताब लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्स में लिखा है कि एक बार वो एक बड़े सिद्ध गुरु से मिलने हिमालय में और ऊपर की और चले गए। स्वामी राम ने प्राणायाम यानी स्वांस पर बहुत काम किया था। लम्बे वक़्त तक वो सांस रोकने में माहिर थे और ध्यान की विधाओं में निपुण थे। बहुत चल कर वो जब उस गुरु के पास पहुंचे तो गुरु ने मिलते ही कहा कि अभी योगी होने में बहुत कमी है। सुन कर स्वामी राम को धक्का लगा और वो तर्क वितर्क करने लगे। देखते ही देखते उस स्वामी ने उन पर थूक दिया। स्वामी राम बड़े आवेश में आ गए। गुरु ने कहा गुस्सा अभी ज्यों का त्यों है।

स्वामी राम भौचक्के रह गए कि एक सिद्ध गुरु ने कितनी बड़ी बात उन्हें किस माध्यम से बतायी। बहुत क्षुब्ध हुए और लौट आये। उन्होंने लिखा कि खुद को स्वामी कहलाने का हक़ तभी है जब वो खुद को साध लें। इसके लिए उन्होंने खुद को एक गुफा में 9 महीने के लिए बंद कर लिया।  9 महीने तक वो अँधेरे में रहे और एक छोटे से छेद से ही हवा और खाना करते थे।  9 महीने बाद जब वो गुफा से निकले तो स्वामी बन चुके थे।

योगी और तपस्वियों की गुफाएं हुआ करतीं थीं। गुरुदेव बाबा ब्रह्मचारी नर्मदा शंकर ने अपना योगी जीवन गुफा से शुरुआत की थी जब उनके गुरु भाई किशन दास ने उन्हें अपनी गुफा में शरण दी थी और वहां से उनकी  ज़िंदगी बदल गयी थी। अपने गुरु बाबा रघुनाथ जी महाराज से ऊनामनी क्रिया सीखने के बाद 4 साल उन्होंने माँ नर्मदा के किनारे गुफा में बिताया। सवाल मन में ये थे कि आखिर एक गुफा में ध्यान कैसे लगाया जाता रहा होगा ? कैसे वक़्त बीतता होगा ? कैसे दुनिया से कट कर सिद्ध किया जा सकता है ?

नर्मदा बाबा के पास बहुत सी कहानियां हैं उन लम्हों की जब जंगल, जानवर, बेरहम मौसम और तन्हाई – ये सब एक योगी को बेहद झकझोर के रख देती हैं। भूख प्यास एक परेशानी हैं और सिद्धि करनी एक चुनौती है। बाबा नर्मदा शंकर बताते हैं कि गुरु के आशीर्वाद से ये संभव है लेकिन नर्मदा के किनारे की गुफाएं बेहद गर्म हो जातीं थीं जिसकी वजह से गर्मियों में ध्यान लगाने में मुश्किलातों का सामना करना पड़ता था। इसकी वजह से उन्हें गर्मियों में हिमालय जाना पड़ता था। खैर एक दिन ऋषिकेश में मैंने उनसे कहा कि बाबा चलो आज गुफा में रहेंगे। बाबा ने हाँ भर दी – जानते थे कि ये बस जिज्ञासा है और कुछ नहीं।

रास्ते भर उनसे पूछता रहा कि क्या कभी ऐसा वक़्त भी आया कि लगा जान जा सकती है। क्योंकि स्वामी राम के साथ ये हुआ कि एक बाघिन आकर बैठ गयीं थीं। पशोपेश में रहे कि क्या करूँ कुछ देर ध्यान किया और जब बारिश रुकी तो वो अपने रास्ते निकल गए और बाघिन अपने रास्ते। बाबा नर्मदा शंकर के साथ बारिश के समय एक बार एक बड़ा नाग सामने आकर खड़ा हो गया। कोई रास्ता नहीं था बाहर जाने का तो बाबा ने ध्यान लगाना शुरू कर दिया। लम्बे वक़्त के बाद जब आखें खोलीं तो पाया की नाग जा चुका था। वो कहते हैं कि जब प्रकृति के साथ एक हो जाते हैं तो सब प्रकृति खुद ही कर देती है। जान लेना या न लेना प्रकृति का काम है।

ऋषिकेश में सबसे पहले बाबा के साथ पहुंचा विशिष्ट गुफा। गहरी गुफा थी जहाँ सिद्ध योगी ने जीवन भर तपस्या की थी। बाकी साधकों को भी ध्यान करने की अनुमति थी लेकिन उसमें रात में कोई ठहर नहीं सकता था। सो हमने करीब 1 घंटे का ध्यान किया और फिर हम एक बेहद  एकांत गुफा की और चल दिए। एक रास्ता ऐसा आया जहाँ मैं, बाबा नर्मदा शंकर और मेरी जीप ही चल रही थी। इंसानी बस्ती दूर जा चुकीं थीं। बाबा ने बताया कि 6 महीने उन्होंने वहां बिताये थे तो एक रात तो साथ रह ही सकते हैं।

शाम 5 बजे का वक़्त था – जीप पहाड़ पर  बहुत ऊपर आ चुकी थी तो एक छोटा सा मंदिर दिखाई दिया। मंदिर के बाहर जीप खड़ी की और अंदर चल दिए। पुजारी ने बाबा को पहचान लिया बाबा को और गुफा का छोटा सा रास्ता खोल दिया। धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। गुफा में एक बल्ब था रौशनी के लिए। गुफा काफी बड़ी थी। बाबा ने पूछा बोलो बाबा क्या ख्याल है। है दम ध्यान लगाने का – एक रात साधु गुफा में रुकने का। अब हिम्मत नहीं थी कि क्या कहूं। लेकिन गुरुदेव ने चुनौती दी तो कुछ तो कहना ही था । मैंने ऊपरी मन से हाँ कह दी लेकिन दिमाग में सांप – बिच्छू होने की ख्याल ध्यान से ज्यादा ताकतवर होने लगे।

 

बाबा ने शायद दिमाग पढ़ लिया कि चेला ध्यान में अभी कमजोर है लेकिन परीक्षा ले रहे थे। खुद आसन सिद्ध हो गए और बोले तुम भी बैठ जाओ। कुछ देर आँखें बंद भी कि लेकिन एक बड़े सांप की कल्पना ने परेशान कर डाला। थोड़ी देर में बाबा नर्मदा शंकर ने हंसकर कहा बोलो चेले चलें क्या – मैं तो यही सुनना चाहता था। बड़े प्रेम से बोले – गंगा किनारे बसे ज्ञान का योगी – नर्मदा के पास हैं प्रेम के रोगी। अभिप्राय ये की प्रेम के बिना हदें तोडना संभव नहीं।

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