विराट कोहली और महेंद्र सिंह धोनी के बैट कैसे बनते हैं, एक्सक्लूसिव रिपोर्ट

नई दिल्ली । शाबिर खान ने कहा कि आज बल्ले नहीं बना सकता आज फुर्सत नहीं है।  लेकिन गुरु टोनी ने कहा कि मेरठ पहुँच चुका हूँ और बैट लेकर ही वापस जाऊंगा। खैर थोड़ी मान मुनव्वल के बाद शाबिर गुरु टोनी के लिए दो बैट बनाने पर राजी हो गया।  थोड़ी देर बाद जब गुरु टोनी ने पुछा कि आखिर व्यस्तता की वजह क्या है तो शाबिर ने कहा कि महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के बल्ले बनने के लिए आये हुए हैं और उनके मैनेजर लगातार फ़ोन पर बैट की बारीकियों की जानकारियां दे रहे हैं।  सुनकर शुरू में यकीन नहीं आया लेकिन कुछ देर बाद धोनी खुद फ़ोन पर आ गए और विलो की जानकारी लेने लगी।  दरअसल बैट बनाने में विलो यानी लकड़ी, बैट का वजन और उसकी शेप बहुत जरुरी है इसीलिए इंटरनेशनल खिलाडी हो या फिर रणजी के प्लेयर हर कोई अपने बैट अपने हिसाब से बनवाता है।

शाबिर ने बताया कि सचिन, गावस्कर, लक्ष्मण, द्रविड़  समेत ज्यादातर खिलाडियों के बैट के पीछे मेरठ के कारीगरों की मेहनत है।  चाहे सचिन मास्टर ब्लास्टर हों या फिर वीरेंद्र सेहवाग हर किसी की पसंद हमारी कारीगरी है।  शाबिर याद करते हैं वो दिन जब वीरेंद्र सेहवाग स्कूटर पर बैट लेने आते थे और घंटों बैट बनने तक फैक्ट्री पर ही इंतज़ार करते थे।  कोलकत्ता नाईट राइडर्स और रणजी के टॉप स्कोरर के वैभव रावल जैसे उभरते खिलाडी भी विलो की फील लेने मेरठ ही आते हैं।

क्रिकेट के दिग्गज खिलाडियों का जैसे ही ज़िक्र आया तो सोचा कि क्यों न आज उन कारीगरों से मिला जाए जो क्रिकेट में खिलाडियों को भगवान् बनाते हैं।  शाबिर ने अपने गोदाम से एक कमरे का ताला खोला और कुछ ख़ास लकड़ियां  वहां से निकलीं।  फिर हमें ले चले अपनी फैक्ट्री की और।  खेतों और खलियानों से होते हुए एक कॉलोनी पहुंचे।  एक कच्चे से मकान में घुसे तो हैरानी हुयी कि क्या महान खिलाडियों के बल्ले ऐसी ही जगह बनते हैं।  शाबिर ने बताया कि इंग्लिश विलो इंग्लैंड से ही आती हैं।  इंग्लैंड से विलो जालंधर आती है और वहां से विलो मेरठ पहुंचती है।  कश्मीरी विलो अब टेनिस के बैट ही बनाने के काम आती है और इंटरनेशनल क्रिकेटर तो सिर्फ इंग्लिश विलो के बैट ही इस्तेमाल करते हैं क्योंकि इस विलो में लोच है।  पूरी दुनिया में सिर्फ इंग्लैंड की लकड़ी के बैट बनाये जाते हैं।

एक कारीगर विलो को छीलता है।  दूसरा आकार देता है।  तीसरा कटिंग करता है।  चौथा बैट को प्रेस करता है।  लेकिन बिना हैंडल के बैट किस काम का।  शाबिर के मुताबिक हैंडल बनाने की कैन सिंगापुर से ही आती है और एक हैंडल को बनाने में 10 दिन का इंतज़ार होता है।  जब बैट की विलो में हैंडल जुड़ता है तब यहीं जाकर एक बल्ला शेप लेता है।  उसके बात बैट का वजन होता है और फिर उसको घिस कर चिकना किया जाता है।  स्ट्रोक प्लेइंग और 20 -20 के बैट अलग अलग तैयार किये जाते हैं।

शाबिर खान ने एक दिलचस्प बात भी बताई कि क्रिकेट का सामान पहले पाकिस्तान के सिआलकोट में बनता था।  बंटवारे के बाद कारीगर उठकर मेरठ  आ गए और 1947 के बाद आजतक ये इंडस्ट्री यहीं जम गयीं।  और दूसरी दिलचस्प बात ये कि क्रिकेट का सामान बनाने वाली कंपनी चाहे कितनी भी बड़ी हो लेकिन उसके मालिक रणजी के खिलाडी जरूर रहे हैं और जिन लालाओं ने सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए इस धंधे में आये उन सभी की दुकाने बंद हो गयीं क्योंकि जब तक विलो और बैट की फील न आये तब तक खिलाडी और बैट बनाने वाले कारीगर में सम्बन्ध नहीं बन सकता।

 

 

 

 

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