दिल्ली क्रिकेट के गुरू,एक्सक्लूसिव इंटरव्यू

नई दिल्ली । दिल्ली ने देश को हमेशा बड़े क्रिकेटर दिए हैं। विराट, शिखर, सहवाग और लिस्ट लम्बी है। इनमें एक नाम ऐसा है जिसे सिर्फ और सिर्फ वक़्त ने भारतीय टीम में जाने से रोका नहीं तो देश को एक और बेहतरीन आलराउंडर मिलता। वो नाम विजय बहादुर मिश्रा का। एक ऐसा खिलाडी जिसकी रगों में क्रिकेट खून बनकर दौड़ता है। जो सोचता क्रिकेट है और जो खेलता क्रिकेट है। सच भी है कि जब तक जूनून न हो तब तक भला मज़ा क्या है। खेल तो कोई भी खेल ले लेकिन जो व्यूह रच सके उसे गुरु कहते हैं। सच में विजय मिश्रा क्रिकेट गुरु हैं।

बात 1982 की है जब एक नौजवान ने अपने घर के हालातों को सुधारने का ज़िम्मा अपने ऊपर उठाया। वो नहीं जानता था कि ये कैसे होगा लेकिन उसमें ऊर्जा – सोच और ज़ज़्बा था। क्रिकेट उसका जूनून था लेकिन पहली सोच थी कि अगर क्रिकेट से कुछ पैसे आये या नौकरी मिल जाये तो बड़ी राहत होगी। विजय एक बढ़िया स्पिनर और शानदार बल्लेबाज था। और हुनर पर धार लगायी उनके गुरु राधेश्याम शर्मा जी ने। एक 40 रुपए का बैट खरीद कर पहुंचे सुभानिया क्लब और शुरुआत की अपने लम्बे क्रिकेट सफर की।

सिर्फ अपनी मेहनत और लगन के बल पर विजय मिश्रा ने दिल्ली और रेलवे से रणजी ट्रॉफी खेली। बॉलिंग का अलाम ये था हॉट वेदर टूर्नामेंट में लगातार 6 मैचों में 5 – 5 विकेट लेकर तहलका मचा दिया। लेकिन कहते हैं कि कभी कभी किसी शानदार चीज को भी नज़र लग जाती है। वही हुआ – एक मैच की आखिरी गेंद सर पर लग गयी। चोट गहरी थी। इतनी गहरी कि इस खिलाडी के इंडिया टीम में बढ़ते कदमों को वो रोक गयी। दो साल क्रिकेट से बाहर रहे। लेकिन हौंसला लगभग आर्मस्ट्रांग जैसा था जो कैंसर के बावजूद जीता। जब सबने विजय के क्रिकेट करियर को ख़त्म समझ लिया तभी इस क्रिकेटर ने वापसी भी की। सिर्फ उस क्रिकेट के लिए जो खून की जगह रगों में दौड़ रहा था।

बचपन से इस खिलाडी ने यशपाल शर्मा को अपना आदर्श माना और एक वक़्त ऐसा आया जब उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की टीम में विजय को शामिल किया। महान बल्लेबाज गुंडप्पा विश्वनाथ ने उनमें एक बेहतरीन आलराउंडर देखा लेकिन किस्मत को इस खिलाड़ी को एक बड़ा गुरु बनाना था। दिल्ली क्रिकेट में विजय बहादुर मिश्रा का कद बहुत बड़ा है। वो 2001 में अंडर 16 टीम के सिलेक्टर रहे और शिखर धवन को सेलेक्ट कर उन्होंने देश को एक बड़ा ओपनर दिया।  2005 में अंडर 17 के कोच भी रहे।

 

वो भला सिलेक्टर रहे या नहीं लेकिन हर कोई दिल्ली क्रिकेट में उनसे सलाह जरूर लेता है क्योंकि सब जानते हैं कि ये गुरु सिर्फ क्रिकेट के प्रति ईमानदार है। यही वजह है कि उन्होंने २० खिलाड़ी रेलवेज को दिए हैं और 30 खिलाडी स्टेट खेल गए हैं। अंडर 19 और अंडर 16 के कप्तान भी विजय भाई के चेले बने।

रिपोर्टर : इंडिया के लिए न खेल पाने का मलाल है

 

विजय : कभी एक कसक थी कि कर सकता था लेकिन वक़्त बादशाह है और हम सबको उसका फैसला मानना चाहिए और जीवन में आगे बढ़ना ही इंसान का काम है

 

रिपोर्टर : आप सचिन, अजय जडेजा और बड़े बड़े खिलाडियों के साथ खेले – क्या आपको लगा कि आपका भी इतना नाम हो सकता था

 

विजय : क्रिकेट मेरी पहचान है। क्रिकेट ने वो दिया जो मैंने सोचा भी नहीं था। बहुत ऋणी हूँ इस खेल का। आज जो भी हूँ – जो नाम कमाया है वो सब इसने दिया है।

और कुछ नहीं चाहिए। बस अब भविष्य के खिलाडियों को गुर सिखाता हूँ।

रिपोर्टर : क्रिकेट में क्या फर्क आया है पहले के मुकाबले

 

विजय : बहुत कम्पटीशन है। स्किल चाहिए – स्ट्रेंथ चाहिए। खास कर मैं समझाता हूँ कि दिस इज ए माइंड गेम। आप दिमाग से कितने स्ट्रांग है वो फील्ड पर दिख जाता है। शतरंज का खेल जैसा है ये। व्यूह रचो और आउट करो – फॉर्मेट चाहे जो हो। पकड़ होनी चाहिए – हार जीत खेल का हिस्सा है।

 

रिपोर्टर : उम्मीद है आप जल्द देश को खिलाड़ी देंगे

 

विजय : मैं सिर्फ सिखा सकता हूँ। खेलना न खेलना खिलाड़ी की मेहनत और लगन और किस्मत पर है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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