क्या सम्राट अशोक ही हैं लाट वाले बाबा ?

नई दिल्ली ।  हमेशा से ही मैं सम्राट अशोक से एक करीबी रिश्ता सा मानता आया हूँ।  न ऐसा सम्राट उनसे पहले कभी हुआ और न ही आने वाले समय में कभी होगा।  लगभग 3000 साल पहले हुए इस सम्राट की ताकत आज तक महसूस की जा सकती है।  एक क्रूर सम्राट से एक संत हृदय में तब्दील हुए अशोक का इतिहास में सानी मिलना मुश्किल है।  पूरी दुनिया में बुद्ध के प्रवचन पहुंचाने में उनकी भूमिका बहुत अहम रही है।  आज भी पूरी भारत सरकार अशोक स्तम्भ से चलती है क्योंकि नेशनल एंब्लेम चार शेर सम्राट अशोक की ही देन है।एक दिन अचानक घूमते हुए फिरोज शाह कोटला में घुस ही गया।  बचपन से इसे देखने की इच्छा थी।  हमेशा जब भी  रिंग रोड से गुजरता तो एक पिलर की तरफ ध्यान जाती था।  उसे देखकर ही लगता था कु ये अशोकन पिलर ही है लेकिन सवाल ये कि आखिर ये फिरोज शाह कोटला में क्या कर रहा है।  एक मुस्लिम शासक के क़िले में अशोकन स्तम्भ ? चलिए एक दिन वो आ ही गया जब बिना कारण फिरोज शाह कोटला पहुँच गया।

घुसते ही कुछ अजीबोगरीब सा लगा – छोटे छोटे आलों में गुलाब के फूल, दिए, अगरबत्तियां और इत्र चढ़ाया हुआ था।  लोग न जाने कहाँ कहाँ से इस क़िले के अंदर दाखिल हो रहे थे।  हिन्दू मुस्लिम दोनों।  दरसल यहाँ जिन्नों की इबादत की जाती है।  उन्हें खुश कर अपने काम कराने की मन्नतें मांगी जाती हैं।  लेकिन मेरा ध्यान अभी पूरी तरह से जिन्नों की तरफ नहीं था हालांकि माहौल में उनकी मौजूदगी को महसूस किया जा सकता था।  मुझे तो वो लाट आकर्षित कर रही थी।

जैसे जैसे क़िले को पार कर लाट के नजदीक पहुंचा तो मेरा शक यकीन में बदल गया कि मीनार ए ज़रीन के नाम से मशहूर ये वास्तव में सम्राट अशोक स्तम्भ है।  270 ईशा पूर्व भारत के सबसे ताकतवर सम्राट ने पुरे  देश में न जाने कितने स्तम्भ गड़वाये थे जिस पर ब्राह्मी भाषा में बुद्ध के कहे हुए वचन लिखे थे।

1356 के आसपास दिल्ली सुल्तनत के सुल्तान फिरोज शाह तुग़लक़ ने यमुना किनारे फ़िरोज़ाबाद बसाया था।  हरियाणा के अम्बाला शहर में घूमते हुए टोपरा घाटी में सुल्तान की नज़र इस अशोक स्तम्भ पर पड़ी।  देखते ही फिरोज शाह मन्त्रमुग्ध हो गया।  इतना मुग्ध कि उसने उसे वहां से दिल्ली लाने का फैसला कर लिया।

दरअसल फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ दो अशोक स्तम्भ दिल्ली आया था – एक अम्बाला से और एक मेरठ से।  फिरोज शाह तुग़लक़ ने एक बड़ी गाड़ी तैयार की जिसमें 42 पहिये लगे थे और उसे 200 लोगों ने दिल्ली तक हांका।  उसके बाद एक बहुत बड़ी नाव में इसे रखकर फिरोज शाह कोटला पहुँचाया गया।  पूरे वक़्त अशोक स्तम्भ हज़ारों किलो कॉटन और सिल्क में लिपटा रहा।  सुल्तान का आदेश था कि स्तम्भ को खरोंच तक नहीं आनी चाहिए।

फिरोज शाह तुग़लक़ ने इस अशोक स्तम्भ के लिए एक पिरामिड नुमा ईमारत का निर्माण भी किया।  फिरोज शाह की क्या सोच रही होगी ये तो फिरोज शाह का कोई आलेख या उनकी जीवनी से पता चल सकता है लेकिन एक  है कि अशोक स्तम्भ में कुछ ऐसा जरूर है जो इसे ताकत – शान्ति और विकास का प्रतीक बनाती है।

सुल्तान फिरोज़शाह तुग़लक़ ने भी इसे अपनी सत्ता से जोड़कर ही देखा होगा।  लेकिन आज पूरे फ़िरोज़ शाह कोटला में जिन्नों का बसेरा है।  अशोक स्तम्भ के नीचे तो ईमारत है उसकी हर आले में जिन्नों की हर वीरवार को पूजा की जाती है।  हिन्दू मुसलमान दोनों ही धरम के लोग यहाँ आकर अपने बिगड़े कामों को बनाने के लिए जिन्नों से दुआएं करते हैं।किसी को ये नहीं पता कि जिन्नों की पूजा यहाँ कब से हो रही है  लेकिन कुछ का मानना है कि मलंग लाडू शाह और बहुत से पीरों और सूफियों ने यहां जिन्नों की इबादत करना शुरू करवाया।   आज जो लोग यहाँ जिन्नों को मनाने आते हैं वो अशोक स्तम्भ को छूना जरूर चाहते हैं उन्हें लगता है कि ये जिन्नों का बादशाह लाट वाला बाबा है जिसकी आवाज सारे जिन्न सुनते हैं।  हर कोई इस लाट को छूना चाहता है ये जाने बिना कि अशोक स्तम्भ है।

 

 

You May Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *