दिल्ली में रूहानी ताकतों का बदला – पार्ट 2

 

नयीदिल्ली। पहली कहानी में हमने आपको बताया था कि कैसे सूफियों के भारत आने के बाद जिन्न और रूहानी ताकतें भी साथ आयीं। इनके आने से दिल्ली में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई। पीरों की मज़ारों और जिन जिन्नातो के दिए दिल्ली में जलने लगे।  लोग भी जुड़ गए अपने काम बनवाने के लिए और इनकी पूजा शुरू हो गयी । अब इसे इंसानों का स्वार्थ कहें या फिर सूफियों की ताकत कि देवताओं की धरती पर उन्होंने ज़िन्नों को भी इज़्ज़त दिलाई।

बात 1930  की है। ब्रिटिश ने दिल्ली में एक क्लब बनवाया था रोशनारा क्लब। विल्बर नाम के एक बड़े अंग्रेज अफसर ने पूरन नाम के एक बच्चे की परवरिश करने की ठानी। पूरन को रोशननारा क्लब में बॉल बॉय की नौकरी दिलवा दी।पूरन की मां गरीब थीं जिसने सब्जियां बेचकर मुशिकल से अपना गुजारा करने का रास्ता तलाशा था।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि रोशननारा क्लब सब्जी मंडी इलाके में है और इसके पास ही रोशननारा की बारादरी भी है। रोशननारा मुग़ल बादशाह शाह जहां की बेटी थीं और बाग बगीचों की बेहद शौक़ीन थीं । उनकी बारादरी को देखकर ही अंग्रेजों ने रोशननारा क्लब बनवाया था।

खैर पूरन ने बॉल बॉय का काम शुरू कर दिया । अंग्रेज टेनिस खेलते थे और पूरन बॉल उठाकर देता था। देखते ही देखते पूरन अंग्रेजों नज़र में चढ़ गया और वो रोशननारा क्लब का एक मजबूत हिस्सा बन गया। उस ज़माने में रोशनआरा क्लब और बारादरी कोई कोई ही जाता था। अंग्रेजों को डर तो था ही, साथ ही जिन्न और पीरों से भी लोग डरा करते थे क्योंकि जब रोशननारा ज़िंदा थीं तब रूहानी खेल खेले जाते थे।

मुग़लों का वो दौर ख़त्म हो गया लेकिन जिन्न और पीर तो यहीं थे । वो तलाश में थे एक ऐसा इंसान जो उन्हें दोबारा इज़्ज़त दे सकता था। उधर पूरन बड़ा हो रहा था। एक दिन बहुत जोर का बुखार आया। इलाज तो बहुत हुआ लेकिन पूरन की आँख चली गयी। अंग्रेजों को लगा कि अब ये किस काम का है सो उसकी नौकरी जाने की बात शुरू हो गयी।15 साल का रहा होगा पूरन, जब ये घटना घटी। बेहद उदास और हारा हुआ महसूस कर रहा था। ठीक होने पर क्लब जाने को तैयार हुआ। उसको भी ये अंदेशा था कि अब उसकी नौकरी जा सकती है।

क्लब का एक रास्ता बारादरी होकर गुजरता था। बारादरी में पेड़ों की वजह से एक जंगल जैसा माहौल था। आँखों में आंसू छलक आये क्योंकि अगर नौकरी गयी तो माँ का सहारा कैसे बनेगा। गरीबी घर में पाँव पसार देगी और हालत बदतर हो जायेंगे । ये सोचता हुआ पूरन अभी बारादरी के बीचों बीच था कि अचानक एक बूढ़ा आदमी सामने आ गया। सफ़ेद लिबास, सफ़ेद दाढ़ी । लेकिन पूरन के लिए वो एक आम बुजुर्ग जैसा ही था।

उस बुजुर्ग व्यक्ति ने पूरन से कहा “क्यों रोता रे बन्दे । तू नेक दिल इंसान है। क्या हुआ ऐसा जो तेरी आँखें भीग गयीं ”

पूरन : मेरी एक आँख चली गयी बाबा और अब नौकरी भी जाएगी।

बुजुर्ग : कौन है जो तेरी नौकरी लेगा। जा तेरी नौकरी नहीं जाएगी और अगर ऐसा हो तो मिलना मुझे यही।

कहकर बुजुर्ग पेड़ों में कहीं खो सा गया। पूरन इतना परेशान था कि समझ नहीं पाया कि आखिर हुआ क्या। वो जब क्लब लौटा तो अंग्रेजों ने उसे बहुत प्यार दिया और कहा कि जब तक वो हैं चिंता करने की बात नहीं है। नौकरी गयी नहीं, साथ पगार भी 10 रुपए हो गयी। पूरन को जैसे लगा की भगवान मिल गए। माँ खुश हो जाएगी और अब गरीबी झेलनी नहीं पड़ेगी। लेकिन उसे याद आया कि ये सब तो उस फ़कीर की वजह से हुआ है। अगले दिन पूरन बारादरी में उसी जगह जाकर खड़ा हो गया और अचानक वो बुजुर्ग आ गया ।

पूरन ने खुशी से सब कुछ बता दिया। वो फ़कीर बोला, गरीबी से बहुत डरता है तू। अगर तेरे घर अभी गरीबी न आये तो क्या तू वो करेगा जो मैं कहूंगा। पूरन ने हाँ भर ली। बुजुर्ग ने कहा तेरे घर के आँगन में नीम का पेड़ है। वहां आकर मैं रहा करूंगा और तुझे एक आले में मेरा दिया जलाना होगा। पूरन ने ख़ुशी से हाँ भर ली। घर आया और आले में दिया करने लगा। नित शाम को वो या उसकी माँ वो चिराग जलाया करती थीं। वक़्त बीतता गया, पूरन की शादी हो गई। बच्चे हो गए लेकिन चिराग जलना बंद नहीं हुआ । देखते देखते उसके  8 बच्चे जवान हो गए । सभी खूब पढ़े और नौकरियों पर लग गए । एक रोशनारा क्लब की छोटी सी नौकरी में पूरन ने वो सब कुछ कर दिखाया जो अमीर लोग कर पाते हैं।

पूरन जानता था कि ये सब उस फ़कीर की बदौलत है । सभी बच्चे खूब कमाने लगे । घर में बहार थी । चिराग रोज जल रहा था । लेकिन हाय उम्र धोखा दे गई । पूरन 80 साल में चल बसा। लेकिन ये राज कि चिराग जरुरी है उसके सीने में ही दफन होकर रह गया । दूसरी पीढ़ी के पास वक़्त कहाँ था उस चिराग को जलाने का। घर में बदलाव किये गए और वो आला बंद करा दिया गया । नीम का वो पेड़ जैसे वीरान हो गया । खैर अनजाने में जो हुआ सो हुआ लेकिन फ़कीर का घर उजड़ गया। रूहानी ताकत अब नाराज थी। सो उसका खामियाज़ा तो भुगतना था। पूरन के बच्चों को अचानक कैंसर होने लगा। उसके पांच बच्चे कैंसर से मरे  और बाकी खौफ में हैं कि न जाने उन्हें कैंसर कब होगा । पैसे की कमी तो किसी घर में नहीं आयी लेकिन लाइलाज बीमारी ने पांव पसार दिए हैं। मामला यहीं नहीं रुका, पूरन के एक जवान पोते की दोनों किडनियां खराब हो गयीं हैं यानी उसकी भी मौत तय है।

 

पूरा परिवार सदमे में तो है लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर चूक कहाँ हुयी है । अब कौन उन्हें बताये कि एक चिराग ही रोशन करना है । लेकिन न  पूरन है और न ही वो फ़कीर ।

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