भूत पिशाचों का अड्डा है ये मकबरा

नई दिल्ली । इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे हैं जिन्हें नही पलटा जाये तो अच्छा। कहानी दिलचस्प भी है और थोड़ी डरावनी भी। कभी कभी लगता है कि बस मन का वहम सा है लेकिन जो महसूस होता है उसे झुठलाना भी आसान नहीं। दरअसल ये इलाका 1000 साल से ज़िन्नों और पिशाचों का अड्डा रहा है। कहते हैं तुर्क अपने साथ बोतलों में बंद कर ज़िन्नों को भारत लाए थे उससे पहले ज़िन्नों का कोई ज़िक्र इतिहास में नहीं है। ज़िन्न और पिशाच से खेल खेलना तुर्कों ने शुरू किया था और कहते हैं इसमें सूफियों ने भी सुल्तानों का बहुत साथ दिया।

दरसल मोहम्म्द ग़ोरी ने जब पृथ्वीराज से दिल्ली का तख़्त छीना उसके बाद दिल्ली में तुर्क शासन की शुरुआत हुयी। ग़ुलाम वंश में सबसे पहले क़ुतुबुद्दीन ऐबक गद्दी पर बैठा। दरअसल ग़ुलाम वंश इसे इसीलिए कहते हैं क्योंकि सभी सुल्तान कभी न कभी ग़ुलाम रहे थे। और चूँकि वो ग़ुलाम थे इसीलिए गद्दी पर पकड़ बनाये रखने के लिए वो रूहानी खेल खेला करते थे। एक दूसरे के खिलाफ षड़यंत्र रचना और फिर उस खेल को अंजाम देने के लिए क़त्ल करना आम बात थी। रज़िया सुल्तान के मरने के बाद ग़यासुद्दीन बलबन ने राजकाज संभाला। वो इल्तुतमिश के उन 40 ग़ुलामों में से एक था जिसने राज पाने के लिए षड़यंत्र रचे और खूनी खेल खेला । कहते हैं कि वो इंसानों के भेष में एक पिशाच ही था  जो कि खून का प्यासा रहता था। रूहानी खेल में ज़िन्नों को खुश करके उसने दिल्ली पर 21 साल तक राज किया।

आज अगर मेहरौली में क़ुतुब मीनार से सटे बलबन के मकबरे के पास जाओ तो एक डर महसूस होता है। गर्मियों के दिन थे। फोटोग्राफी के लिए मैं बलबन के मकबरे पर गया।  1000 साल पुरानी क़ब्र। टूटी इमारत और एक खूनी सुल्तान। कहानी ज़बरदस्त है किसी भी फोटोग्राफर के लिए जो कैमरे में कहानी उतारते हैं। खैर 1 बजे का वक़्त था और ये टाइम फोटोग्राफी के लिए तो एकदम माकूल नहीं था सो मैंने थोड़ा आराम करने का फैसला किया। बलबन के मकबरे के आसपास आज भी दिल्ली सल्तनत के खंडहर हैं जो आज भी किसी को आसरा नहीं देते। मैंने एक कीकर के नीचे शरण ली। फोटोग्राफी करते करते आप थोड़े से सेंसिटिव हो जाते हैं। हवा और मौसम में बदलाव को पकड़ लेते हैं। लगभग २ घंटे तक कुछ नहीं हुआ लेकिन 3 बजे के आसपास एक गंद आयी। और बहुत तेजी से आयी। ये इत्र था।

गुलाब का इत्र। देखते ही देखते वो इत्र दिमाग में जैसे घुस सा गया। एक बार को ऐसा लगा कि किसी ने इत्र की पूरी शीशी अपने उप्पर उड़ेल रखी है और वो व्यक्ति मुझसे बस एक हाथ दूर है। समझ ने काम करना बंद कर दिया। मैं एक बुत सा हो गया। भागने का कोई विकल्प नहीं था। रुकने की हिम्मत नहीं थी। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन एक रूहानी ताकत बिलकुल सामने खड़ी थी। गला सूख चूका था। हाथ पाँव ठन्डे थे। अभी हौंसला जुटा भी नहीं पाया था कि मेरी मदद के लिए सिक्योरिटी गॉर्ड आ गया। बोला साहेब वक़्त ठीक नहीं है चले चलो मेरे साथ नहीं तो फंस जाओगे खेल में। अभी कुछ सोचने और हिम्मत दिखाने वक़्त नहीं था सो गॉर्ड के पीछे पीछे हो लिया। ठीक आदमी था बचाव किया उसने। उसने बताया मुझे कि 3 बजे दिन में और 1 बजे रात में गुलाब की खुश्बू फ़ैल जाती है। एक औलिया ने बताया था कि अगर महक आये तो समझ लेना एक बड़ी रूहानी ताकत मौजूद है। औलिया के मुताबिक ज़िन्नों को यहाँ आज़ाद किया गया था और वो हर गुरूवार को एक फेरा जरूर लगाते हैं क्योंकि सुल्तान बलबन आज भी रूहों से काम करवाता है और लोगों को गुलाम बनाने के खेल उसका जारी है। बहुत से सुल्तान और अंग्रेज अफसर इस खेल में फंस चुकें हैं।एक फोटोग्राफर और फ़िल्मकार के लिए मसाला ज़बरदस्त था लेकिन ये बात झूठी नहीं है कि गुलाब के इत्र की आज भी जेहन में है।

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